क्रिकेट हो या कबड्डी: बराबर है विश्वविजेता बनना

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भारत ने कबड्डी वर्ल्ड कप में एक बार फिर से इतिहास रचते हुए खिताब पर अपना कब्जा कायम रखा। शनिवार को अहमदाबाद के ‘द एरेना बाय ट्रांसस्टेडिया’ पर ईरान की टीम को 38-29 से रौंद कर भारत लगातार तीसरी बार विश्वचैम्पियन बना। हालांकि मैच की शुरुआत में ईरानी टीम ने भारत पर दबाव बना दिया था और मैच के दूसरे हाफ में भी वह बहुत देर तक भारत से आगे चल रही थी, पर भारत की इस जीत के नायक रहे अजय ठाकुर ने शानदार खेल दिखाते हुए न केवल मैच में भारत की वापसी कराई बल्कि जीत की यादगार हैट्रिक की मुश्किल दिख रही राह भी आसान कर दी।

सांस रोक देने वाले फाइनल मुकाबले में एक समय 19-14 से पिछड़ रही भारतीय टीम ने अजय ठाकुर की शानदार रेड के बाद वापसी की और एक ही बार में ईरान के दो खिलाड़ियों को बाहर कर दिया। इसके बाद भारत ने मैच में पकड़ बनाए रखी। एक वक्त पर 5 अंकों से पिछड़ रही टीम इंडिया ने स्कोर को 20-20 से बराबर कर दिया और ईरान की टीम को ऑल आउट कर मैच में 24-21 की बढ़त ले ली। इसके बाद भारत ने कोई गलती नहीं कि और मैच अपने नाम कर लिया। अजय ठाकुर के साथ ही प्रदीप, अनूप, सुरजीत समेत बाकी खिलाड़ियों ने भी शानदार खेल दिखाया।

जो जीता वही सिकंदर – इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन ईरान की टीम को भी दाद देनी होगी कि उसने मैच में फेवरेट मानी जा रही भारतीय टीम को कड़ी चुनौती पेश की। अपनी रेड और मजबूत डिफेंस से ईरान ने जता दिया कि इस खिताब के लिए वह सब कुछ झोंक देने के इरादे से उतरा है। पर अंत में भारतीय टीम ने अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखाते हुए विश्वविजेता का खिताब बरकरार रखा।

भारत की इस जीत ने बता दिया कि क्यों उसे कबड्डी का पर्याय माना जाता है। आज पूरा देश टीम इंडिया की इस उपलब्धि पर गौरवान्वित हो रहा है। पर यहाँ एक सवाल पूछने को दिल करता है कि क्या कबड्डी का विश्वविजेता कहलाना क्रिकेट या बाकी खेलों का विश्वविजेता कहलाने से कमतर है? क्या ऐसी उपलब्धियों पर होने वाली खुशियों में कोई फर्क है? अगर नहीं तो हम क्रिकेट के सामने बाकी खेलों का दर्जा दोयम क्यों कर देते हैं?

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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