ऑस्कर, ग्रैमी और अब नोबेल: आईये बॉब डिलन को जानें

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पचास साल पहले गायक, गीतकार और संगीतकार बॉब डिलन ने अपने दूसरे ही एलबम में समय के बदलाव की बात की थी। समय बदलता है, लोग भी बदलते हैं, पर शायद इतनी जल्दी नहीं। लगभग पचास साल बाद नोबेल सम्मान देने वाली समिति ने तय किया है कि इस बार साहित्य का नोबेल पुरस्कार बॉब डिलन को दिया जाएगा। यह घोषणा सुखद भी है और चौंकाने वाली भी। सुखद इसलिए है कि गीत-संगीत के क्षेत्र में बॉब डिलन ने जो लोकप्रियता और प्रतिष्ठा हासिल की, उसके बाद ऐसे बड़े सम्मान के हकदार वह बहुत पहले से ही थे। और चौंकाने वाली इसलिए है कि बॉब डिलन उन अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं, जिन अर्थों में हमने इन दिनों साहित्य को देखना शुरू कर दिया है। वह मूल रूप से एक गायक हैं, जो अपने गीतों का संगीत भी खुद ही तैयार करते हैं और गीत भी खुद ही लिखते हैं। और भारत की तरह ही तकरीबन पूरी दुनिया में गीतों को साहित्य से कब का खारिज किया जा चुका है। लेकिन स्वीडन की नोबेल समिति ने इस सोच को बदल दिया है। बॉब डिलन को पुरस्कार की घोषणा में कहा भी गया है कि उन्हें यह पुरस्कार ‘अमेरिका की महान गीत परंपरा में नई काव्य अभिव्यक्ति’ के लिए दिया गया है। बॉब डिलन अब दुनिया के पहले ऐसे शख्स बन गए हैं, जिन्हें ऑस्कर अवार्ड भी मिला है, ग्रैमी अवार्ड भी और अब नोबेल पुरस्कार भी। इसके अलावा उन्हें पुलित्जर का विशेष पुरस्कार भी मिल चुका है। अब उन्हें एक बड़े रॉक स्टार के रूप में ही नहीं, एक कवि के रूप में भी याद किया जाएगा।

बॉब डिलन के महत्व को समझने के लिए हमें 1960 के उस दशक को समझना होगा, जब पूरी दुनिया में अलग तरह की उथल-पुथल थी। पूरी दुनिया में युवा असंतोष तरह-तरह से उभर रहा था। अमेरिका वियतनाम के युद्ध में इस कदर फंस गया था कि वहाँ पर युद्ध विरोधी माहौल बन गया था। इस युवा असंतोष को आवाज़ दी एक अनजान से यहूदी गायक ने, जिसका नाम था बॉब डिलन। उनका पहला एलबम ‘ब्लोइंग इन द विंड’ न सिर्फ हिट रहा, बल्कि अमेरिका के युद्ध विरोधी आंदोलनों का समूह गान भी बन गया था। पश्चिमी देशों की एक नहीं, पूरी दो पीढ़ियां ऐसी हैं, जो बॉब डिलन के गीतों को न सिर्फ सुनकर, बल्कि गुनगुनाकर बड़ी हुई हैं। परंपरा से अलग हटकर सोचने की कला उन्होंने बॉब डिलन से ही सीखी है। इन्हीं पीढ़ियों के लोग इन दिनों दुनिया भर की प्रतिष्ठित संस्थाओं में ऊंचे पदों पर स्थापित हैं। संभव है, साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए बॉब डिलन के चुनाव के पीछे एक कारण यह भी रहा हो। पुरस्कार की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया यही सुनाई दी कि यह तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। वैसे इसी के साथ हमें यह भी बताया गया है कि उनके नाम पर पिछले कई साल से विचार हो रहा था।

बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद साहित्य पर भी उन दायरों को तोड़ने का दबाव बनेगा, जिनमें हमने उसे जाने-अनजाने में बांध दिया था। लेकिन एक सच यह भी है कि कई परंपरागत साहित्य क्षेत्रों में इस पर तीखी प्रतिक्रिया भी आई है। इनविन वेल्श जैसे साहित्यकार ने इसका खुलकर विरोध किया है। यह कहा जा रहा है कि बॉब डिलन महान हैं, लेकिन इस पुरस्कार के हकदार नहीं। एक प्रतिक्रिया यह भी सुनाई दी है कि यह पुरस्कार नॉस्टेलजिया के चलते दिया गया है, बॉब डिलन के किसी साहित्यिक योगदान के लिए नहीं। जाहिर है कि इस पुरस्कार के बाद साहित्य की भाषा भी बदलेगी और परिभाषा भी। अपनी जवानी में बॉब डिलन ने दुनिया के संगीत को बदला था, अब 75 साल की उम्र में वह साहित्य की परिभाषा बदल रहे हैं।

बोल डेस्क, सौजन्य हिन्दुस्तान (संपादकीय, 15 अक्टूबर 2016)

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