अद्भुत है इस ‘अमिताभ’ की आभा

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आज 74 साल के हो गए अमिताभ। अमिताभ यानि कभी ना बुझने वाली लौ। अपने काम से अपने नाम को परिभाषित करने वाले बिरले ही होते हैं और अमिताभ बच्चन नाम का ये शख्स उन्हीं चंद लोगों में एक है। कितनी अद्भुत बात है कि पिता हरिवंश राय बच्चन के घनिष्ठ मित्र सुमित्रानंदन पन्त जन्म के बाद बालक अमिताभ को देखने नर्सिंग होम गए थे और देखते ही कहा था – कितना शांत दिखाई दे रहा है, मानो ध्यानस्थ अमिताभ। यह सुनकर माता-पिता ने अपने बच्चे को यही नाम दे दिया और उस बच्चे को देखिए, उसने उस नाम में उसके अर्थ से कहीं अधिक ‘आभा’ भर दी।

अमिताभ आज ‘संज्ञा’ से ‘विशेषण’ में तब्दील हो चुके हैं। सफलता के पर्याय बन चुके हैं। सिनेमा से जुड़ा हर शख्स उनके जैसा बनना-दिखना चाहता है। उनकी कामयाबी को दोहराना चाहता है। कारण यह कि उनके व्यक्तित्व में जीवन के वो सारे रंग हैं, जिन्हें पाने के लिए इंसान को सदियां लग जाती हैं। कहना गलत ना होगा कि आधुनिकता और परंपरा का जितना सुन्दर और सटीक मिश्रण उनमें है, जीवित भारतीयों में उतना किसी और में नहीं। वे सही मायनों में ‘सम्पूर्ण’ हैं और ये सम्पूर्णता जितनी नैसर्गिक और दैवी है उतनी ही हाड़तोड़ मेहनत और अथक संघर्ष है उसके पीछे।

पढ़ाई-लिखाई के बाद अमिताभ को कोलकाता के एक फर्म में नौकरी मिल गई थी। पर उनके मन में सपने कुछ और थे। खैर, मुंबई जाने से पहले उन्होंने 1963 से 1968 तक पाँच साल कलकत्ता में गुजारे। इस बीच दो प्राइवेट कम्पनियों में काम किया। नौकरी के साथ मटरगश्ती भी खूब की। कोयले का व्यवसाय करने वाली बर्ड एंड हिल्जर्स कम्पनी में उनकी पहली पगार पाँच सौ रुपए थी तो दूसरी कम्पनी ब्लैकर्स में उनकी अंतिम पगार थी 1680 रुपए।

नौकरी से अमिताभ की बाहरी जरूरतें भले ही पूरी होती रही हों लेकिन भीतर की भूख ज्यों की त्यों थी। नौकरी करते हुए भी अपनी दिनचर्या को उन्होंने थियेटर और सिनेमा के अपने शौक पर हावी ना होने दिया। वो ना केवल बना रहा बल्कि बढ़ता रहा। रंगमंच पर वे लगातार खुद को मांजते रहे और एक दिन फिल्मों की ओर रुख कर लिया। कोलकाता से वे मद्रास पहुँचे और वहाँ से मुंबई। अभिनेता बनने के आकांक्षी अमिताभ बच्चन का पहला फोटो अलबम उनके छोटे भाई अजिताभ ने तैयार कराया था, जो अब काम आने वाला था।

पहली फिल्म सात हिन्दुस्तानी में काम के बदले अमिताभ को मेहनताने में पाँच हजार रुपए मिले थे। यह फिल्म उन्होंने दिल्ली के शीला सिनेमा में अपने माता-पिता के साथ देखी थी। जब इस फिल्म को देख कर मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने उनकी तारीफ की तो अमिताभ लजा गए थे। शुरुआती दिनों में वे जलाल आगा की विज्ञापन कम्पनी में अपनी आवाज़ भी उधार दिया करते और बदले में प्रति विज्ञापन पचास रुपए पाते, जो तब उनके लिए पर्याप्त रकम हुआ करती। ये वो दिन थे जब काम की तलाश और खाली जेब साथ-साथ चला करती और अमिताभ वर्ली स्थित सिटी बेकरी से आधी रात के समय आधे दाम में मिलने वाले टूटे-फूटे बिस्कुट खरीदते और चाय के साथ खाकर गुजारा करते।

अमिताभ की शुरुआती एक दर्जन फिल्में बुरी तरह फ्लॉप हुईं। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘अपशकुनी’ हीरो माना जाने लगा। कोई उन्हें घर लौट जाने की सलाह देता तो कोई कवि बनने की। ऐसे में ‘जंजीर’ आई और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, सो नहीं हुई।

‘जंजीर’ में अमिताभ ने पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका की थी। पुलिस की वर्दी में वे जंचेंगे या नहीं, प्रकाश मेहरा (इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक) को शक था। तब सलीम-जावेद ने कहा था कि इस रोल के लिए अमिताभ बच्चन से अच्छी कोई चॉइस हो ही नहीं सकती। इस बात का विश्वास मेहरा को पहले दिन की शूटिंग के दौरान ही हो गया। हुआ यूँ कि पुलिस चौकी के इस दृश्य में खान के रूप में प्राण साहब आते हैं और इंस्पेक्टर अमिताभ के सामने रखी कुर्सी पर बैठने लगते हैं। प्राण को बैठने का अवसर ना देते हुए अमिताभ कुर्सी को धकेलकर संवाद बोलते हैं – ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं..। शॉट देने के बाद प्राण प्रकाश मेहरा को हाथ पकड़कर एक ओर ले जाते हैं और कहते हैं – प्रकाश, अभिनय तो कई वर्षों से करता आ रहा हूँ, पर ऐसा जबर्दस्त अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ। मैं तुम्हें आज ही बता देता हूँ कि हिन्दी सिनेमा को एक बड़ा भारी एक्टर मिल गया है। दीवार पर लिखी इबारत मुझे साफ नजर आ रही है। शायद ये ‘ग्रेटेस्ट स्टार’ होगा।

प्राण साहब का कहा सच हुआ। आज अमिताभ बॉलीवुड के बिग बी हैं, शहंशाह हैं, सदी के महानायक हैं और उनका ये डायलॉग हकीकत बन चुका है कि वो जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार (चार बार) और फिल्म फेयर पुरस्कार (11 बार) समेत पुरस्कारों और पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्म विभूषण समेत सम्मानों की लम्बी फेहरिस्त है उनके नाम।

आज आनंद, अभिमान, जंजीर, दीवार, शोले, चुपके-चुपके, कभी-कभी, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकन्दर, त्रिशूल, डॉन, काला पत्थर, लावारिस, सिलसिला, नमक हलाल, शक्ति, कुली, शराबी, मर्द, शहंशाह, अग्निपथ, हम, खुदा गवाह, मोहब्बतें, कभी खुशी कभी गम, कभी अलविदा ना कहना, आँखें, बागबान, ब्लैक, सरकार, चीनी कम, भूतनाथ, पा, पीकू, वजीर और पिंक जैसी फिल्में उनके खाते में है और इनमें उनके अभिनय के इतने रंग हैं कि एक्टिंग का पूरा स्कूल खुल जाय, पर अपनी हर अगली फिल्म में कुछ नया करने और देने की उनकी छटपटाहट आज भी ज्यों की त्यों है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका उत्साह और जुनून आज की पीढ़ी के अभिनेताओं से बीस ठहरेगा। यही कारण है कि आज जबकि उनके तमाम समकालीन अभिनेता अपनी चमक बिखेर कर गायब हो चुके हैं, अमिताभ करोड़ों दिलों पर राज कर रहे हैं। सचमुच अद्भुत हैं अमिताभ। ईश्वर उन्हें चिरायु प्रदान करें!

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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