बिहार में शराब को मिली ‘बेल’, उधर शहाबुद्दीन गए जेल

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पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से एक ही दिन नीतीश कुमार को ‘असहज’ करने वाले दो फैसले आए।  इधर पटना हाईकोर्ट ने बिहार में लागू शराबबंदी कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। उधर सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब कांड में राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन को मिली जमानत रद्द कर दी। जमानत रद्द होते ही शहाबुद्दीन ने सरेंडर तो कर दिया पर जेल जाते-जाते अपने ‘जनाधार’ का हवाला देते और ‘लालूजी को अपना नेता बताते’ हुए अगले चुनाव में नीतीश को ‘सबक’ सिखा देने की बात कह गए।

बहरहाल, पटना हाईकोर्ट से आया फैसला नीतीश कुमार के लिए सचमुच बड़ा झटका है। ‘मिशन 2019’ को ध्यान में रख नीतीश शराबबंदी को देशव्यापी मुद्दा बनाना चाह रहे थे और उन्हें इसके लिए देश भर में चर्चा भी मिल रही थी। ऐसे में इस फैसले से उन्हें कितनी निराशा हुई होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

नीतीश सरकार ने 5 अप्रैल 2016 को शराबबंदी को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “सरकार ने जो नोटिफिकेशन जारी किया था, वो संविधान के दायरे में नहीं आता। इसे जबरन लागू नहीं किया जा सकता। ” हाईकोर्ट ने शराब मिलने पर पूरे परिवार को जेल भेजने जैसे कानून को लेकर एतराज जताया। इस कानून में दोषी पाए जाने पर उम्रकैद या 10 लाख के जुर्माने या फिर दोनों का प्रावधान था, जिसे ‘काफी कठोर’ बताते हुए कोर्ट ने सवाल खड़े किए। शराबबंदी कानून का उल्लंघन करने पर पूरे गांव या शहर पर सामूहिक जुर्माने का प्रावधान भी था, जिस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरे गांव या शहर पर जुर्माना कैसे लागू होगा, इस बारे में संशोधित कानून में कुछ भी नहीं कहा गया है। यहाँ तक कि जुर्माने को चुनौती देने का प्रावधान भी नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई व्यक्ति शराब की बोतल लेकर बिहार के रास्ते दूसरे राज्य में जा रहा है तो उसे भी पकड़ा जा रहा है, जबकि सरकार के नोटिफिकेशन में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है। इस कारण भी यह नोटिफिकेशन निरस्त होने लायक है।

अब बात सीवान के ‘साहेब’ की। पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद 10 सितंबर को पूर्व सांसद शहाबुद्दीन जेल से बाहर आए थे, पर उनकी रिहाई ‘चार दिन की चांदनी’ साबित हुई। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उनके मामले में फैसला सुनाते हुए अपने आदेश में कहा कि “हमने मामले के सभी रिकॉर्ड और पहलुओं पर ध्यानपूर्वक विचार किया है। शहाबुद्दीन के खिलाफ सिद्ध और लंबित आरोपों को भी देखा। व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सामाजिक हितों के बीच संतुलन तथा जमानत कानूनों को देखते हुए हमें लगता है कि हाईकोर्ट ने जमानत का आदेश इन सब पहलुओं और तथ्यों को नज़रअंदाज करते हुए दिया है। जबकि ये चीजें मुकदमे पर असर डालने में सक्षम हैं।”

कोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया कि शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए और हत्याकांड के ट्रायल को जल्द पूरा किया जाए। इसके बाद पूर्व सांसद ने सीवान कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया, जहाँ से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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