असंभवों को साधते दिनकर

0
189
ramdhari-singh-dinkar
ramdhari-singh-dinkar

‘उर्वशी’ को अपनी कलम से उकेरना और फिर ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ भी करना, ‘कुरुक्षेत्र’ पर निगाह रखते हुए ‘संस्कृति के चार अध्याय’ लिखना यानि सभी असंभवों को एक साथ साधना – यह केवल और केवल दिनकर ही कर सकते थे। लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम के गाता चल / नम होगी यह मिट्टी जरूर, आंसू के कण बरसाता चल – यह दिनकर की कल्पनाशीलता है कि वह प्रेम के बल पर लोहे के पेड़ के हरे होने की बात करते हैं, और यह आत्मविश्वास भी उन्हीं का है कि वह खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करते हैं – मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं।

नामवर सिंह ने एकदम सही रेखांकित किया है कि “दिनकर जी को सूर्य कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि सूर्य का एक ही रंग नहीं होता है और सूर्य में ताप ही नहीं होता है, रोशनी भी होती है। उस प्रकाश के, उस आलोक के अनेक रंग होते हैं, बल्कि धरती पर जितने रंग दिखाई पड़ते हैं, वे सारे के सारे रंग और रंग-बिरंगे पुष्प सूरज की रोशनी से ही हैं। सूरज न हो, तो उतने रंग धरती पर नहीं होंगे।”

करीब पाँच दशक लंबे कालखंड में सृजनरत रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं की व्यापकता का आलम यह है कि वह गांधी से लेकर मार्क्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिन्दू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिन्दुत्व और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों तक को परखते हुए विपुल लेखन करते हैं। गांधी और मार्क्स को लेकर उनमें एक खास तरह का द्वंद्व देखने को मिलता है। हिंसा और अहिंसा के बीच का उनका द्वंद्व भी उनकी रचनाओं में दिखाई देता है। जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था, तब दिनकर ने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ लिखी, जिसमें उन्होंने अपने तर्कों के आधार पर हिंसा और अहिंसा के इस्तेमाल के दर्शन को स्पष्ट किया।

दिनकर ने स्वीकार किया है कि “मैं जीवन भर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूँ। इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का रंग है।” लेकिन यह भी दो टूक कह दिया है कि “साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद के समर्थन में लिखवाए और न किसी स्टालिन की, जो हमें साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने-फलने नहीं दे सकता। हमारे लिए फरमान न तो क्रेमलिन से आ सकता है, और न आनंद भवन से। अपने क्षेत्र में तो हम सिर्फ उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे, जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है।”

दिनकर राष्ट्रवादी कवि हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। उनकी कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर रहे हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि दिनकर उस राष्ट्रवाद के समर्थक थे, जो नफरत की बुनियाद पर टिका है। उनकी रचनाओं में हम जिस उग्र राष्ट्रीयता को देखते हैं उसके पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था। हाँ, यह सही है कि उन्होंने घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था, लेकिन उसको उद्धरणों से स्पष्ट भी किया था। उनका मानना है कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई। इसी तरह, भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहाँ के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे। अब यहाँ अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ यह बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है, तो यह उनके साथ अन्याय होगा। कुछ लोगों ने यह अन्याय उनके साथ हाल के दिनों में (राष्ट्रीयता और असहिष्णुता पर बहस के दौरान) किया।

एक बात और। दिनकर की राष्ट्रीयता पर विमर्श करते हुए हम अक्सर अन्तर्राष्ट्रीयता पर उनका दृष्टिकोण भूल बैठते हैं। अपनी एक कविता ‘राष्ट्रदेवता का विसर्जन’ में उन्होंने बड़े साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अन्तर्राष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो, तो उसका विदा होना बेहतर है। स्पष्ट है कि दिनकर विश्वशांति और मैत्री को लेकर उतने ही चिन्तित थे जितना अपने राष्ट्र के लिए। बल्कि इसे उनकी राष्ट्रीयता का ही विस्तार कहें को गलत ना होगा।

सौ बात की एक बात यह कि ‘सूर्य’ अपना प्रकाश हर जगह बराबर बाँटता है। वह चाहे तो भी संकुचित नहीं हो सकता। हम किसी भी समय और संदर्भ में दिनकर की राष्ट्रीयता की पुनर्व्याख्या क्यों ना कर लें, हमें उनके ‘राष्ट्रकवि’ होने का और पुख्ता प्रमाण मिलेगा, इसमें जरा भी संदेह नहीं होना चाहिए।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप [‘हिन्दुस्तान में प्रकाशित अनंत विजय के एक आलेख पर आधारित]

Comments

comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here