बड़े गहरे हैं ‘पिंक’ के रंग

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अमिताभ के दमदार अभिनय और रितेश शाह की दिलचस्प कहानी से सजी फिल्म ‘पिंक’ अलग कैनवास और संदर्भ में ‘दामिनी’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की याद दिलाती है। ‘पिंक’ लड़के-लड़कियों के प्रति समाज में प्रचलित धारणाओं और मान्यताओं की असमानता और पाखंड को बड़ी शिद्दत से उजागर करती है। अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में बनी यह पहली हिन्दी फिल्म है। गौरतलब है कि अनिरुद्ध ने बांग्ला में ‘अनुरणन’ और ‘अंतहीन’ जैसी फिल्में निर्देशित की हैं, जिन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। शुजीत सरकार इस फिल्म के क्रिएटीव प्रोड्यूसर हैं। बतौर निर्देशक ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘पीकू’ तक हम उनका रेंज और उनकी क्षमता देख चुके हैं।

‘पिंक’ एक के बाद एक ऐसे कई प्रश्नों को उठाती है जिनके आधार पर लड़कियों के चरित्र के बारे में बात की जाती है। मसलन लड़कियों के चरित्र घड़ी की सुइयों के आधार पर तय किए जाते हैं। कोई लड़की किसी से हंस-बोल ली या किसी लड़के साथ कमरे में चली गई या फिर शराब पी ली तो लड़का यह मान लेता है कि लड़की ‘चालू’ है और उसे ‘आमंत्रित’ कर रही है। यह फिल्म उन लोगों के मुँह पर तमाचा जड़ती है जो लड़कियों के पहनावे पर सवाल उठाते हैं। अदालत में अमिताभ बच्चन करारा व्यंग्य करते है कि हमें ‘सेव गर्ल’ नहीं बल्कि ‘सेव ब्वॉय’ पर काम करना चाहिए क्योंकि जींस पहनी लड़की को देख ‘बेचारे’ लड़के उत्तेजित हो जाते हैं और लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करने लगते हैं। फिल्म में ये सीन इतना कमाल का है कि आप सीट पर बैठे-बैठे कसमसाने लगते हैं।

फिल्म की कहानी को दिल्ली-फरीदाबाद में सेट किया गया है। शायद इसलिए कि हाल के दिनों में महिला-उत्पीड़न की कई घटनाएं यहाँ हुईं, जिनकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी। बहरहाल, इस कहानी के केन्द्र में हैं तीन लड़कियां – मीनल (तापसी पन्नू), फलक (कीर्ति कुल्हारी) और एंड्रिया (एंड्रिया तारियांग), जो अपने पैरों पर खड़ी हैं और दिल्ली के एक पॉश इलाके में एक फ्लैट किराए पर लेकर रहती हैं। एक रात वे सुरजकुंड में रॉक शो के लिए जाती हैं, जहाँ राजवीर (अंगद बेदी) और उसके साथियों से उनकी मुलाकात होती है। मीनल और उसकी सहेलियों का बिंदास अंदाज देख उन्हें लगता है कि इन लड़कियों के साथ कुछ भी किया जा सकता है और राजवीर मीनल के साथ ‘हद’ पार करने लगता है। मीनल अपने बचाव में उसके सिर पर बोतल मारकर उसे घायल कर देती है और बस यहीं से फिल्म के ‘ट्विस्ट’ और ‘टर्न्स’ शुरू हो जाते हैं। कहानी तब और दिलचस्प बन जाती है जब इसमें वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) की एंट्री होती है।

इंटरवल के बाद फिल्म कोर्ट रूम ड्रामा में बदल जाती है। पिछले महीने रिलीज हुई ‘रुस्तम’ में भी कोर्ट रूम ड्रामा था, लेकिन हकीकत में यह कैसा होता है इसके लिए ‘पिंक’ देखी जानी चाहिए। फिल्म के विचार इसी कोर्ट रूम में और दीपक सहगल के किरदार के जरिये रखे गए हैं, पर वे थोपे हुए नहीं लगते क्योंकि वे फिल्म की कहानी से जुड़े हुए हैं।

दीपक सहगल के किरदार को अमिताभ बच्चन ने जीवंत कर दिया है। कुछ दिनों बाद वे 74 वर्ष के हो जाएंगे, लेकिन अभी भी उनके पास देने को बहुत कुछ है। फिल्म के दो-तीन दृश्यों में तो उन्होंने गजब ढा दिया है। खास तौर पर उस दृश्य में जब वे किसी महिला के ‘नो’ के बारे में बताते हैं। वो कहते हैं कि नहीं का मतलब ‘हाँ’ या ‘शायद’ ना होकर केवल ‘नहीं’ होता है, चाहे वो अनजान औरत हो, सेक्स वर्कर हो या आपकी पत्नी हो।

अमिताभ के सामने होने के बावजूद प्रतिद्वंद्वी वकील के रूप में पीयूष मिश्रा ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और ये बड़ी बात है। तीनों लड़कियों में तापसी पन्नू ने अधिक छाप छोड़ी है। हालांकि कीर्ति और एंड्रिया ने भी अपना काम संजीदगी के साथ किया है। अंगद बेदी ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। सच तो यह है कि कलाकारों के अच्छे अभिनय ने जानदार स्क्रिप्ट में और जान डाल दी है। फिल्म का बैंकग्राउंड म्यूजिक उम्दा है और कई जगह खामोशी का लाजवाब उपयोग किया गया है। अनिरुद्ध का निर्देशन और शुजीत की ‘निगरानी’ तो खैर कमाल की है ही।

‘बोल बिहार’ के लिए रूपम भारती

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