पोती और नातिन के नाम अमिताभ की पाती

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बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी पोती अराध्या और नातिन नव्या नवेली के नाम एक चिट्ठी लिखी और उसे फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट किया। चिट्ठी पढ़ते हुए उनका वीडियो लाखों लोगों ने देखा। वायरल हुई उनकी इस चिट्ठी की कई लोगों ने बड़ी तारीफ की और इसे दिल को छू लेने वाली बताया। वहीं, कई लोगों ने इसकी आलोचना की और कुछ लोगों ने कहा कि अपनी फिल्म ‘पिंक’ को प्रमोट करने का तरीका खोजा है उन्होंने। बहरहाल, शिक्षक दिवस के दिन सार्वजनिक की गई इस चिट्ठी को हम किसी सूरत में खारिज नहीं कर सकते, इतना पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है। कम-से-कम एक बार तो इसे हर बेटी को जरूर पढ़ना चाहिए।

अमिताभ ने अराध्या और नव्या को संबोधित करते हुए लिखा है कि तुम दोनों अपने नाजुक कंधों पर एक अनमोल विरासत संभाल रही हो। अराध्या अपने परदादा डॉ. हरिवंश राय बच्चन की और नव्या अपने परदादा श्री एच.पी. नंदा की। उन्होंने लिखा कि तुम दोनों के परदादाओं ने तुम्हारे मौजूदा उपनामों को काफी सम्मान, गौरव और पहचान दिलाई है। पर ये उपनाम उन परेशानियों या चुनौतियों से नहीं बचा पाएगा जिनका एक महिला होने के नाते तुम्हें सामना करना है।

उन्होंने लिखा कि चूंकि तुम महिलाएं हो, लोग तुम पर अपनी सोच थोपेंगे, तुम्हारे लिए सीमाएं तय करेंगे। वे तुमसे कहेंगे कि किस तरह के कपड़े पहनो, किस तरह के व्यवहार करो, तुम किससे मिल सकती हो, कहाँ जा सकती हो। लेकिन लोगों की धारणाओं के साये में मत जीना। अपने विवेक से तुम अपने फैसले लेना। अंतत: अपने काम के नतीजे का सामना तुम्हें ही करना है, इसीलिए ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिन्ता कभी मत करना।

73 वर्षीय अभिनेता ने जोर देकर कहा कि अगर कोई तुम्हारी स्कर्ट के साइज से तुम्हारे चरित्र को आंक रहा है तो ऐसे लोगों की सोच से कतई प्रभावित ना हों। उन्होंने ये भी कहा कि वे शादी तभी करें जब वे शादी करना चाहती हों। इसके अलावा शादी करने की कोई और वजह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने उनसे कहा कि ये दुनिया महिलाओं के लिए एक मुश्किल दुनिया है लेकिन ये विश्वास भी जताया कि उन जैसी महिलाएं ही इसे बदलेंगी। साथ ही भावुक कर देने वाली ये इच्छा भी जताई कि वो चाहते हैं कि लोग उन्हें अमिताभ बच्चन के रूप में नहीं उनके दादा और नाना के रूप में जानें।

अब प्रश्न यह उठता है कि अमिताभ की इस चिट्ठी में आलोचना करने जैसी क्या बात है? इस पर बात करने से पहले हम आलोचना को दो हिस्से में बाँट लें। पहले हिस्से में वे सतही लोग हैं जो इस चिट्ठी के ‘मर्म’ तक पहुँच ही नहीं सकते, सो बाज़ार के इस युग में वे इस चिट्ठी को ‘पिंक’ के प्रमोशन का जरिया बता रहे हैं, जिसे सिरे से खारिज करने की जरूरत है। अब दूसरे हिस्से की आलोचना जो गंभीर प्रकृति के लोगों ने की है और अमिताभ का कट्टर प्रशंसक होने के बावजूद की है। इस हिस्से में वे लोग हैं जो इस चिट्ठी में अमिताभ की ‘चिन्ता’ को नहीं ‘चिन्तन’ को देखना चाहते थे। इन लोगों को ये कमी खली कि अमिताभ ने अपनी तीसरी पीढ़ी को जितनी ‘स्वतंत्रता’ दी, उस अनुपात में उन्हें ‘संस्कारित’ करते नहीं दिखे। उन्होंने ‘अधिकार’ तो बताए लेकिन ‘कर्तव्य’ का बोध कराने में कोताही बरती।

अमिताभ ने इस चिट्ठी में वस्त्र यानि ऊपरी आवरण से चरित्र को आंकने वालों को तवज्जो ना देने की बात कही जो सौ फीसदी सही है लेकिन चरित्र को अपनी सभ्यता और संस्कृति से जोड़ना भूल गए। डॉ. हरिवंश राय बच्चन के अत्यन्त सुयोग्य पुत्र की इस चिट्ठी से तब अधिक खुशी मिलती जब इसमें जीवन के ‘मूल’ की बात होती। समाज और परिवार में नारी के स्थान और हमारी समृद्ध संस्कृति में उनके योगदान की चर्चा होती।

एक बात और, अमिताभ ने इस चिट्ठी में अराध्या और नव्या से अपने-अपने परदादा यानि पितृपक्ष की विरासत को संभालने की बात कही है। क्या ऐसा कहकर अमिताभ कई विरोधाभासों से घिरे पितृसत्तात्मक समाज को स्वीकृति नहीं दे रहे? क्या अराध्या और नव्या का अपने मातृपक्ष की विरासत से कोई ताल्लुक नहीं? इस पर उनका कोई अधिकार और इसके प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं?

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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