‘संत मदर टेरेसा ऑफ कोलकाता’

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आज सारी दुनिया एक ऐतिहासिक पल की गवाह बनी। गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए जीवन समर्पित करने वाली ‘भारतरत्न’ मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में संत की उपाधि दी गई। ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने लगभग एक लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी में उन्हें ‘संत’ की उपाधि से नवाजा। इस दौरान पीटर्स बेसीलिका पर मदर टेरेसा की एक बड़ी तस्वीर लगाई गई थी, जिसमें वह नीचे लोगों की ओर मुस्कराती प्रतीत हो रही थीं। गौरतलब है कि मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि उनकी 19वीं पुण्यतिथि से एक दिन पहले दी गई है। अब वो ‘संत मदर टेरेसा ऑफ कोलकाता’ के नाम से जानी जाएंगी।

मदर टेरेसा ने सिस्टर से संत बनने का सफर भारत में पूरा किया था। यहीं से उनकी ममता और करुणा की ज्योति पूरे संसार में फैली। स्वाभाविक है कि इस बेहद खास मौके पर वहाँ भारत का प्रतिनिधित्व हो। लिहाजा भारत की महानतम शख्सियतों में शुमार ‘मदर’ को संत की उपाधि दिए जाने के समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ वेटिकन सिटी में मौजूद थीं। केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के अलावा दिल्ली और पश्चिम बंगाल से दो राज्यस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी रोम में थे, जिनका नेतृत्व क्रमश: अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी ने किया। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की सुपीरियर जनरल सिस्टर मेरी प्रभा के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आईं लगभग 50 ननों का एक समूह भी इस समारोह के दौरान मौजूद रहा।

मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्ये में कोसोवर अल्बेनियाई माता-पिता के घर जन्मी मदर टेरेसा का मूल नाम गोंक्जा एग्नेस था। 1928 में महज 18 साल की उम्र में नन बनने की खातिर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था। घर छोड़ने के बाद वो आयरलैंड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी (सिस्टर्स ऑफ लोरेटो) के साथ जुड़ गईं। यहाँ उन्हें नया नाम मिला – सिस्टर मेरी और वो कोलकाता के लिए निकल पड़ीं। वर्ष 1931 में वो कोलकाता की लोरेटो एन्टाली कम्यूनिटी से जुड़ीं और लड़कियों के सेंट मेरी स्कूल में पढ़ाने लगीं। बाद में वो प्रिंसिपल बनीं। 1937 के बाद से उन्हें मदर टेरेसा के नाम से पुकारा जाने लगा। कहा जाता है कि 1941 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान ईश्वर ने उन्हें गरीबों के लिए काम करने को प्रेरित किया। इसके बाद वो लोरेटो से इजाजत लेकर 1948 में मेडिकल ट्रेनिंग के लिए पटना आईं।

ये कम लोगों को पता है कि मदर टेरेसा ने पटना सिटी में होली फैमिली अस्पताल में मेडिकल ट्रेनिंग ली थी। पटना में ये अस्पताल पादरी की हवेली (सेंट मेरी चर्च) से सटा है। तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान मदर इस हवेली के एक छोटे से कमरे में रहती थीं। उनकी याद में इस कमरे को अब तक सहेज कर रखा गया है। कहने की जरूरत है कि मदर को संत घोषित किए जाने के बाद ये जगह किसी तीर्थ से कम नहीं होगी। बहरहाल, 1948 के बाद ही मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की स्थापना की और उसके बाद की कहानी से पूरी दुनिया वाकिफ है। 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था और 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया था।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि दिए जाने के लिए जरूरी था कि वैटिकन मदर टेरेसा से मदद के लिए की गई प्रार्थनाओं के परिणामस्वरूप हुए दो चमत्कारों को मान्यता दे। इस संबंध में स्मरणीय है कि 2002 में पोप ने एक बंगाली आदिवासी मोनिका बेसरा के ट्यूमर ठीक होने को मदर का पहला चमत्कार माना था। इसके बाद 2015 में ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त एक ब्राजीलियन पुरुष के ठीक होने को उनका दूसरा चमत्कार माना गया। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के साथ ही उन्हें ‘संत’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया था।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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