‘मोहेंजो दारो’: कहाँ चूके गोवारिकर?

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Hrithik Roshan
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बहुप्रतीक्षित और बहुप्रचारित फिल्म ‘मोहेंजो दारो’ आई और चली गई। हैरत की बात है कि ‘लगान’ और ‘जोधा अकबर’ जैसी फिल्में देने वाले निर्देशक (आशुतोष गोवारिकर), अपने व्यक्तित्व से ‘जादू’ करने वाले स्टार (ऋतिक रोशन), ऑस्कर विजेता संगीतकार (एआर रहमान) और हजारों साल पुरानी सभ्यता (मोहेंजो दारो) के एकदम अनछुए ‘कैनवास’ के बावजूद फिल्म मुँह के बल गिर गई। इसे ना तो आम लोगों ने सराहा और ना ही ये क्रिटिक्स को लुभा पाई। बॉक्स ऑफिस पर ‘बाढ़’ लाने की उम्मीद से उतरी फिल्म ‘सूखे’ का शिकार हो गई। सवाल उठता है, ऐसा हुआ क्यों? आखिर क्या कमी रह गई इसमें? चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले कहानी। आशुतोष गोवारिकर ने जितनी मेहनत ‘मोहेंजो दारो’ के शिल्प पर की है, काश उतनी ही इसकी ‘आत्मा’ यानि कहानी पर करते! उन्होंने जिस कहानी को अपनी कल्पनाओं का जामा पहनाकर ‘मोहेंजो दारो’ में रखा है, उसे दर्शक सैकड़ों बार देख चुके हैं। जरा गौर फरमाएं। एक हीरो है जो गांव से शहर आता है। खूबसूरत हीरोइन को दिल दे बैठता है। हीरोइन की शादी फिल्म के मुख्य विलेन के लड़के से तय है जिसका उस शहर पर राज है। विलेन अपने रास्ते से हीरो को हटाना चाहता है। हीरो के पिता की वर्षों पहले इस विलेन ने ही हत्या की थी। हीरो को एक और मकसद मिल जाता है। वह ना केवल प्यार हासिल करता है बल्कि शहर के लोगों को भी बचाता है। बस इसी घिसी-पिटी कहानी को अलग लुक और फील देने के लिए आशुतोष गोवारिकर हजारों साल पुराने दौर में चले गए। सेट और कॉस्ट्यूम में उलझकर वो जैसे भूल बैठे कि दर्शकों को बांधने के लिए अच्छी कहानी पहली शर्त होती है।

फिल्म की शुरुआत में मोहेंजो दारो को प्रमुखता मिली है। कैसे व्यापार होता था? कैसे लोग रहते थे? कैसे समय की गणना की जाती थी? लेकिन धीरे-धीरे मोहेंजो दारो पीछे छूट जाता है और रूटीन कहानी हावी हो जाती है। फिर कहानी में मोहेंजो दारो है या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी क्रम में कई और बातें भी हैं जो अखरती हैं। स्पेशल इफेक्ट्स और वीएफएक्स उनमें से एक है। ये सब प्रभाव देखने में अच्छे तो लगते हैं, लेकिन इनका तकनीकी स्तर बहुत खास नहीं है, सामान्य है। इसी तरह रहमान का संगीत और जावेद साहब की कलम से निकले गीत बेहद सामान्य से हैं। म्यूजिक और बैकग्राउंड म्यूजिक दोनों ही विभागों में रहमान का काम उनकी प्रतिभा के अनुरूप नहीं है।

कुल मिलाकर सौ करोड़ रुपये की लागत वाली ‘मोहेंजो दारो’ अपने शिल्प की वजह से ध्यान खींचती है। माहौल की वजह से बांधती है। ऋतिक रोशन की मौजूदगी की वजह से आकर्षित करती है। लेकिन बहुत सारी बातों की वजह से यह एक ठोस मनोरंजक फिल्म नहीं बन पाती। स्क्रिप्ट एकदम बेदम है और ऋतिक भी स्क्रीन पर अच्छे लगने के बावजूद किरदार के करीब नहीं लगते। फिल्म के गानों पर वो आज के स्टेप्स करते नजर आते हैं जो हजम नहीं होता। बाकी कलाकारों की बात करें तो उल्लेख करने जैसा कुछ भी नहीं।

कुल मिलाकर ‘मोहेंजो दारो’ में ‘जोधा अकबर’ जैसी भव्यता, चमक और बांधने वाली कहानी नहीं है और ना ही ‘लगान’ वाली बारीकी और सहजता। धूल-मिट्टी तो लगान में भी बहुत थी, लेकिन उसमें अलग ही बात थी। फिर भी गोवारिकर के इस प्रयास की सरहाना तो होनी ही चाहिए कि उन्होंने मोहेंजो दारो को पृष्ठभूमि बनाकर फिल्म बनाने का ‘जोखिम’ उठाया। इसी तरह के जोखिम सिनेमा को जिन्दा करते और जीवंत रखते आए हैं।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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