अब नहीं बिकेगी कोख

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Surrogacy
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केन्द्रीय कैबिनेट ने 24 अगस्त को सरोगेसी नियमन विधेयक को मंजूरी दे दी। इस बिल का उद्देश्य देश में सरोगेसी के व्यावसायीकरण पर पूरी तरह रोक लगाना है। हाल के वर्षों में भारत सरोगेसी हब बन गया था और अनैतिक सरोगेसी की घटनाएं सामने आती रहती थीं। इस बिल के बाद सिर्फ भारतीय नागरिकों को सरोगेसी का अधिकार होगा। एनआरआई और ओसीआई कार्ड होल्डर अब किराए की कोख के जरिए बच्चे हासिल नहीं कर सकते।

सरोगेसी बिल के मुताबिक केवल वे नि:संतान भारतीय दंपती, जिनकी शादी को कम से कम पाँच साल पूरे हो चुके हों, बच्चा पाने के इस तरीके का इस्तेमाल कर सकते हैं। बशर्ते कि उनकी इनफर्टिलिटी साबित होती हो। सिंगल पैरेंट्स, होमोसेक्सुअल कपल और लिव इन पार्टनर सरोगेसी के हकदार नहीं होंगे।

बिल में स्पष्ट किया गया है कि बच्चा चाहने वाले दंपतियों की करीबी रिश्तेदारों को ही सरोगेट माँ बनने की अनुमति होगी। अपनी कोख से बच्चे को जन्म देने की पेशकश करने वाली महिला केवल एक बार ऐसा कर सकेगी। बिल के अनुसार किराए की कोख से जन्मे बच्चे को सम्पत्ति पर वैसे ही अधिकार होंगे जैसे कि स्वयं दपति से जन्मे बच्चे या दत्तक बच्चे के होते हैं।

सरकार ने इस बिल के जरिए सरोगेसी को रेग्यूलेट करने की दिशा में कई बड़े और कड़े कदम उठाए हैं। बिल में केन्द्रीय स्तर पर नेशनल सरोगेसी बोर्ड तथा राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश स्तर पर स्टेट सरोगेसी बोर्ड के गठन का प्रस्ताव भी है।

मनुष्य के जन्म का कारोबारीकरण रोकने की दिशा में सरकार ने जैसी इच्छाशक्ति दिखाई है वो निश्चित रूप से सराहना योग्य है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बिल्कुल सही रेखांकित किया कि ‘जरूरत’ के लिए शुरू की गई सरोगेसी की सुविधा अब ‘शौक’ बन गई है। शाहरुख और आमिर जैसे सेलिब्रिटिज का नाम लिए बगैर उन्होंने कहा कि बड़ी हस्तियों के पास जिनके ना सिर्फ दो बच्चे हैं, बल्कि बेटा और बेटी दोनों हैं, वे भी सरोगेसी का सहारा लेते हैं। सरोगेसी के शौकिया दुरुपयोग का एक और उदाहरण तुषार कपूर ने पेश किया जब सरोगेसी का सहारा लेकर वे सिंगल पैरेंट बने।

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरोगेसी का ‘कारोबार’ बन जाना मानवीय जीवन की गरिमा पर कितना गंभीर खतरा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ विदेशियों को किराए की कोख से मनमाफिक बच्चा नहीं मिला तो उन्होंने बच्चा लेने से ही मना कर दिया और मजबूर स्त्री के पास अपनी आर्थिक बदहाली के बावजूद एक विकलांग विदेशी बच्चे को पालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।

हालांकि इस बिल को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं। खासकर लिव इन पार्टनरों और सेम सेक्स पार्टनरों के लिए सरोगेसी बैन करने को एक प्रतिगामी कदम बताया जा रहा है। गौरतलब है कि सरकार ने लिव इन और समलैंगिक संबंधों को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए उन्हें संज्ञान में ना लेने की बात कही है और विदेशियों के लिए इसे प्रतिबंधित करने का एक कारण वहाँ तलाक ज्यादा होना बताया है, जिससे कुछ लोगों की असहमति है।

वेसे देखा जाय तो सरोगेसी पर कानून बनाते हुए सरकार ने पर्याप्त विवेक से काम लिया है और फिर ये सामान्यतया संभव भी नहीं कि इस तरह का कोई निर्णय सौ फीसदी ‘निर्विवाद’ हो। इसके बावजूद ‘असामान्य’ कहे जाने वाले संबंधों (लिव इन और समलैंगिक) को स्वीकार करने या ना करने के सवाल को सरकार सरोगेसी से नहीं जोड़ती और संतानोत्पत्ति में असमर्थ सभी ‘जोड़ों’ को सरोगेसी का विकल्प अपनाने की छूट दी जाती तो शायद वो अधिक आदर्श स्थिति होती!

बोल बिहार के लिए रूपम भारती

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