मोरे नैन बसो कान्हा

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Krishna
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आज कृष्ण जन्माष्टमी है। कृष्ण का अर्थ होता है काला, श्याम, गहरा नीला। हिन्दू धर्म में सफेद रंग को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन, कृष्ण पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिनके काले रंग के आगे दुनिया नतमस्तक होती है और उन्हें अपना आराध्य स्वीकार करती है। स्वीकार्यता की ऐसी भावना किसी अन्य देव के प्रति कहीं भी नहीं दिखती। कृष्ण एकमात्र ऐसे देवता हैं जो तमाम विसंगतियों के बावजूद पूरी दुनिया में ग्राह्य हैं। संसार के हर देश में उनके भक्त हैं, हर प्रांत में उनके मंदिर हैं। वो ईश्वर से अधिक अपने भक्तों के सखा हैं, मित्र हैं, प्रेमी हैं। भक्त चाहे किसी भी धर्म का हो उनके सान्निध्य में आकर असीम शांति महसूस करता है। बात चाहे कृष्ण के भक्त सूरदास की हो या समाज की बेड़ियों को तोड़कर कृष्ण रंग में रंगने वाली मीराबाई की या फिर चाहे उनके मुस्लिम भक्त रसखान की। सब कृष्ण के रंग में रंगकर कृष्णमय हो जाते हैं। वहां जाति और धर्म की तमाम दीवारें गिर जाती हैं। कुछ ऐसा है इस कान्हा का जादू।

कृष्ण के जीवन की अगर बात करें तो उनका सारा जीवन-वृत्त संसार से अलग एक नई धारा की कहानी कहता है। अमावस्या की घनघोर रात्रि के ठीक 12 बजे वो जन्म लेते हैं। भारतीय संस्कृति में अमावस्या को शुभ अवसर नहीं समझा जाता। तिस पर से रात के 12 बजे का वक्त घोर आसुरी प्रवृत्ति का द्योतक माना जाता है। ऐसे ही वक्त में इस युगपुरुष का जन्म होता है। अपने जन्म के साथ ही कृष्ण एक ऐसे सामाजिक परिवर्तनकारी के तौर पर खुद को साबित करते हैं जो आनेवाले वक्त में सारी व्यवस्था को बदल देता है।

ब्रज में माता यशोदा की ममता की छांव में वो ऐसी अद्भुत बाल लीलायें रचते हैं जो हजारों-लाखों साल बाद आज भी भारतीय जनमानस के हृदय में रची-बसी हुई हैं। वहाँ कई मिथकों को तोड़ वो समाज को एक नई राह दिखाते हैं, भगवान् इन्द्र के घमंड को तोड़कर वो लोगों को प्रकृति का महत्व समझाते हैं, तो मथुरा में भी अपने आगमन के साथ बदलाव की बयार लाते हैं। वर्षों से राजा कंस के आतंक से त्रस्त जनता को मुक्ति प्रदान कर वो एक ओर उन्हें नया जीवन देते हैं तो दूसरी ओर राजगद्दी पर अपने नाना अग्रसेन को बिठाकर अपने निर्विकार स्वभाव का परिचय भी देते हैं।

स्त्री-पुरुष के प्रेम की तो कृष्ण ऐसी अद्वितीय मिसाल देते हैं कि आज भी मंदिरों में उनकी पूजा ‘राधा-कृष्ण’ के रूप में होती है। संसार की संभवत: ये पहली ऐसी प्रणय जोड़ी है जो परिणय सूत्र में बिना बंधे समाज में पूजनीय हैं। राधा को कृष्ण अपने समूचे व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनाते हैं तो दूसरी ओर अपने शत्रु रुक्मी की बहन रुक्मिणी के प्रणय निवेदन को स्वीकार कर उन्हें अपनी पटरानी का दर्जा देते हैं। रुक्मिणी के समर्पण और प्रेम की भावना को ये मान सिर्फ कृष्ण ही दे सकते हैं। इतिहास में ये अपनी तरह का पहला मौका है जब किसी स्त्री के प्रणय निवेदन को किसी पुरुष ने इतनी सहजता से स्वीकार किया हो। ये वो दृष्टि है जो कृष्ण को अपने समय और युग से आगे ले जाकर विश्वपुरुष बना देती है। इसी तरह एक और संदर्भ असुर नरकासुर की कैद से आजाद कराई गई 16 हजार स्त्रियों से उनके ‘विवाह’ करने का भी है। निश्चित रूप से ऐसा कर कृष्ण समाज को एक नई सोच प्रदान करते हैं।

कृष्ण अपने प्रगतिवादी विचारों को सिर्फ स्वयं तक सीमित नहीं रखते। वो अपनी सखा द्रौपदी और अपनी सगी बहन सुभद्रा को भी उतनी ही स्वतंत्रता देते हैं और यहाँ तक कि इच्छानुरूप वर चुनने में उन्हें सहयोग भी करते हैं। अनेक लांछनों और आरोपों को स्वीकार कर भी वो स्त्री को अपने जीवन में वो उच्च स्थान देते हैं जो कदाचित् अन्य किसी देवता या पुरुष ने आज तक उन्हें नहीं दिया।

द्रौपदी के साथ उनकी अभिन्न मित्रता फिर से स्त्री-पुरुष संबंध की एक नई परिभाषा को गढ़ती है। द्रौपदी की हर पुकार को आत्मसात कर कृष्ण ने अपनी ‘कृष्णा’ की रक्षा की। द्वंद्व और मानसिक उहापोह के घने अंधेरों में भी वो हर कदम पर द्रौपदी के साथ खड़े रहे और उन्हें सारी परिस्थितियों से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। आज भी ये मित्रता संसार में अतुलनीय स्थान रखती है।

अपने युग के सबसे बड़े परिवर्तनकारी कृष्ण ने आवश्यकता पड़ने पर यदि शस्त्र उठाया तो पलायन भी किया। अधर्म के नाश के लिए नीति और सिद्धांत बनाये तो छल का भी सहारा लिया। उन्होंने अपने युग के तमाम बड़े महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त किया तो उतनी ही सहजता से उनके श्राप को भी ग्रहण किया। लेकिन, तमाम परिस्थतियों में भी उन्होंने धर्म को सबसे उच्च माना और उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगाने के साथ-साथ अपनों के खिलाफ युद्ध को भी उचित ठहराया।

उस कृष्ण के एक नहीं अनेकों रूप हैं। वो बाल-गोपाल है तो गईयों का चरवाहा भी है। वो राधा का कृष्ण है तो गोपियों का स्वामी भी है। वो ग्वालों का बंधु है तो अपनी मईया का लाडला भी है। वो रूक्मिणी का पति है तो द्रौपदी का सखा भी है। वो अर्जुन का माधव है तो भक्तों का गोंसाईं भी है। हम कृष्ण को गौर से देख भर लें तो सब कुछ फिर ‘कृष्णमय’ है। सच तो यह है कि ‘कृष्ण’ है, तो ही ये संसार है। “मोरे नैन बसो कान्हा कि अब तुम बिन कोई ठौर नहीं।”

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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