इनके पेट से तय होती है परिभाषा 15 अगस्त की

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A Child selling Indian Flags
A Child selling Indian Flags

15 अगस्त के क्या मायने हैं आपके लिए? माफ कीजिएगा, 15 अगस्त क्या है और क्यों है, ये मैं नहीं पूछ रहा आपसे। आपने बहुत कुछ पढ़ और सुन रखा होगा इसके बारे में। निबंध और भाषण की कोई कमी नहीं इस विषय पर। अखबारों और पत्रिकाओं के तो विशेषांक निकलते हैं इस दिन। आप कोई भी चैनल खोल लें 15 अगस्त को, इस बात की गारंटी है कि ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘सुनो गौर से दुनिया वालों’ जैसे गाने ही सुनेंगे केवल। कहने की जरूरत नहीं कि देश आजाद हुआ था इस दिन। फिर मैं इस दिन के मायने क्यों पूछ रहा हूँ? दरअसल, मैं 15 अगस्त की वो परिभाषा आपसे नहीं पूछ रहा जो सबके लिए एक समान है। मैं जानना ये चाहता हूँ कि इस दिन का अर्थ आपके लिए क्या है? या है भी कि नहीं?

कोई आश्चर्य की बात नहीं अगर ये सारी बातें अटपटी लग रही हों आपको! शायद आपकी छुट्टी खराब हो रही हो इन सवालों से? हो भी क्यों ना? दौड़ती-भागती ज़िन्दगी में एक पूरा दिन छुट्टी का मिलना सचमुच बड़ी बात है। उसे तो जाया नहीं ही होना चाहिए। इस दिन या तो आप पूरी तरह आराम करना चाहेंगे, या बीबी-बच्चों से किया बाहर घुमाने या सिनेमा दिखाने का वादा पूरा करना चाहेंगे या अगर आप कुछ ज्यादा ही कामकाजी हैं तो कुछ छूटे हुए काम निबटाना चाहेंगे। जाहिर है इनमें से आप कोई भी काम कर रहे हों तो उसमें कोई बुराई नहीं। पर क्या आप सोच सकते हैं कि आज़ादी के 70वें साल में भी इस देश में बहुत बड़ी आबादी वैसे लोगों की है जिनके लिए 15 अगस्त का मतलब बस पेट भर खाना है और जो इस दिन का इन्तजार साल भर बड़ी शिद्दत से करते हैं कि उन्हें मनचाहा खाना मिल जाएगा? जी हाँ, देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गए लेकिन हाथ से मुँह की और मुँह से पेट की दूरी नहीं घटी।

अभी कल की बात है कि मैं शाम के वक्त पटना के डाकबंगला चौराहे से गुजर रहा था। अचानक मुझे ध्यान आया कि मेरी बेटी ने मुझे स्कूल में होने वाले 15 अगस्त सेलिब्रेशन के लिए झंडा लाने को कहा था। मैं आसपास नज़रें दौड़ाने लगा क्योंकि मुझे पता है कि पटना के इस अतिव्यस्त चौराहे पर 26 जनवरी या 15 अगस्त को कई बच्चे झंडा बेचते मिल जाते हैं। अभी मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि एक 8-9 साल का बच्चा दिख गया जो संयोग से मेरी ही ओर आ रहा था।

वो बच्चा अब मेरे सामने खड़ा था। मैंने उससे झंडे का दाम पूछा। उसने 5 का एक और 10 का तीन बताया। बेटी के कहे मुताबिक मैंने उससे पूरे बारह झंडे लिए और 10-10 के चार नोट पकड़ा दिए। बच्चा बड़ा खुश हुआ। पैसा पॉकेट में रखते हुए उसने बड़े उत्साह से कहा कि आज उसने पूरे चार सौ तीस रुपये कमाए हैं, जबकि रात होने में दो-तीन घंटे बाकी हैं। उसे विश्वास था कि आज वो छह सौ से ज्यादा कमा लेगा। मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने पूछ लिया कि वो बाकी दिनों में क्या बेचता है और कितना कमाता है? उसने कहा कि दुर्गापूजा में उसके बाबूजी उसे ‘माता’ की चुन्नी बेचने को देते है, छठ में वो सूप बेचता है और बाकी दिनों वो कैलेंडर या खिलौने जैसी चीजें बेचता है। लेकिन सबसे अच्छी कमाई आज के दिन होती है, जिस दिन गांधीजी आज़ादी लेकर आए थे। गांधीजी आज़ादी कहाँ से लाए थे, पूछने पर वो नहीं बता पाया बल्कि उसने उल्टा मुझसे पूछ लिया कि गांधीजी आज़ादी लेकर एक ही बार क्यों आए? कितना अच्छा होता कि वो बार-बार आज़ादी लेकर आते, फिर साल में कई बार 15 अगस्त आता और वो मजे से छह सौ या उससे भी ज्यादा कमा लेता!

उसकी बातें सुनकर मेरे भीतर क्या कुछ चल रहा था, ये मैं बयां नहीं कर सकता। एकदम जड़वत-सा हो गया था मैं। फिर भी एक बात पूछने से मैं खुद को नहीं रोक पाया कि इन छह सौ रुपयों का वो करेगा क्या? उसने तुरत बताया कि वो ये रुपये अपने बाबूजी को देगा। उसके बाबूजी ने आज मां से कहा है कि अगर वे तीनों मिलकर आज अच्छा कमा लेंगे तो रात का खाना घर पर नहीं, झुग्गी के पास वाले ढाबे पर खाएंगे। उसने ये भी बताया कि आज के दिन पिछले साल भी उन लोगों ने ‘पार्टी’ की थी। ये कहकर उसने कहा अंकल, अब मैं जाऊँ? अभी छह सौ में एक सौ सत्तर कम हैं। मैंने उसके गाल छुए और कहा जाओ बेटे, और बहुत देर तक उसे एकटक जाते देखता रहा।

 बोल बिहार के लिए राधा कृष्णा

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