झुग्गियों से बाहर जहां और भी हैं

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Patna Slum Kids
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घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती है… अपने नक्शे के मुताबिक ये जमीं कुछ कम है… कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है झुग्गियों में जीवन बसर करने वालों के लिए। लगभग नारकीय स्थितियों में रह रहे इन खानाबदोशों के लिए घर चांद पाने जैसा मुश्किल है। एक अदद घर की तलाश इन्हें ना जाने कहाँ-कहाँ, किन-किन गलियों में लेकर जाती है पर इनका सफर है कि खत्म ही नहीं होता।

एक आँकड़े के मुताबिक दुनिया के सबसे ज्यादा शहरी गरीब और झुग्गियों में रहने वाले लोग भारत में हैं। साल 2011 तक भारत में झुग्गियों में रहने वालों की आबादी 9 करोड़ 30 लाख थी। ये संख्या वियतनाम की कुल आबादी के बराबर है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह कि साल 2001 में यही आबादी 4 करोड़ 30 लाख थी यानि महज एक दशक में झुग्गियों में रहने वालों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ी, और आबादी के अनुपात में ही बदहाली बढ़ी।

झुग्गियों में रहने वालों की आबादी लगातार बढ़ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसरों में कमी। अपने पेट और परिवार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से लोग बड़ी संख्या में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। पलायन की ये रफ्तार ऐसी ही रही तो एक आकलन के मुताबिक साल 2050 तक भारत के शहरों में और 30 करोड़ की आबादी जुड़ जाएगी। बिहार की राजधानी पटना की ही बात करें तो कुछ साल पूर्व यहाँ 3 लाख 43 हजार लोग झुग्गियों में रह रहे थे और अब जबकि ये शहर दिन-ब-दिन फैल रहा है और अधिकांश इलाके सीमेंट के जंगल में तब्दील होते जा रहे हैं, जाहिर है कि झुग्गियों का नक्शा भी उसी अनुपात में फैल रहा होगा।

आँकड़े बताते हैं कि झुग्गियों में 44 प्रतिशत आबादी कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की है और इनमें सें अधिकांश प्रवासी मजदूर हैं। इनके अतिरिक्त एक बड़ी आबादी रिक्शा चालकों और सेक्स मजदूरों की है। एक और महत्वपूर्ण आँकड़े के मुताबिक भारत की झुग्गियों में रहने वाले 37 प्रतिशत लोग दलित और 32 प्रतिशत 18 साल से कम उम्र के हैं। भारत की ये संतानें शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, साफ पानी और यहाँ तक कि शौचालय के मायने भी नहीं जानतीं। आँकड़ों की ही मानें तो 18.9 प्रतिशत लोग अब भी खुले में शौच जाते हैं। कुपोषण, अधिक शिशु मृत्यु दर, सामाजिक असुरक्षा जैसी समस्याएं तो जैसे आम बात हैं इनके लिए।

केन्द्र की वर्तमान सरकार ने साल 2015 में शहरी भारत का कायाकल्प करने के लिए तीन बड़े मिशन की शुरुआत की। ‘अमृत’ यानि अटल नवीनीकरण और शहरी विकास मिशन, सभी के लिए आवास मिशन और बहुचर्चित स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 500 नए शहर विकसित करने, 100 स्मार्ट शहर बनाने और 2022 तक शहरी क्षेत्रों में सभी को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। यहाँ एक बड़ा सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं के सहारे झुग्गियों में रहने वाले 9 करोड़ 30 लाख लोगों की नैया पार लग जाएगी?

इससे पहले भी केन्द्र की पिछली सरकारों ने जेएनयूआरएम यानि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन, राजीव आवास योजना और बाल्मिकी-अंबेडकर आवास योजना तो बिहार सरकार ने बिहार राज्य मलिन बस्ती नीति 2011 जैसे उपक्रम कर शहरी गरीबों को भूमि, आवास और अन्य बुनियादी सुविधाएं देने की कोशिश की हैं। पर समस्या इतनी बड़ी है कि ये तमाम कोशिशें अपर्याप्त साबित हुई हैं। पूछे जाने पर सरकार अपनी परेशानियां गिनाती हैं तो विपक्ष इसे इच्छाशक्ति की कमी करार देता है

इस पूरे परिदृश्य को देखते हुए आवश्यकता इस बात की है कि प्राइवेट सेक्टर अपने सामाजिक दायित्व को शिद्दत से समझे और ऐसी योजना लेकर आए जिससे केन्द्र और राज्य सरकार का भार हल्का हो सके। कितना अच्छा हो कि किसी स्लम का काया-कल्प करने के लिए जितने घरों की आवश्यकता हो उतने बनाये जायें और एकदम मुफ्त दिए जाएं, साथ ही कुछ घर ऐसे भी बनाये जायें जिन्हें साधनसंपन्न लोग बाजार मूल्य पर खरीद सकें। इस तरह ना तो भार स्लम में रहने वालों के ऊपर पड़ेगा, ना सरकार के ऊपर और ना ही प्राइवेट सेक्टर के ऊपर और समाज को कुछ देने का सुख मिलेगा वो अलग। सरकार को बस जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित करनी है।

एक बात और, दुनिया के विभिन्न देशों की झुग्गियों का अध्ययन ये बताता है कि ये उन्हीं जगहों पर बसती और बढ़ती हैं जहाँ बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध हो। भारत के योजना आयोग ने भी इसकी पुष्टि की है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जरूरत इस बात की है कि झुग्गियों की वर्तमान जगह पर ही आवासीय परियोजना हो ताकि झुग्गीवालों का रोजगार ना छिने और उन्हें अपने सपनों की छत भी मिले, तमाम बुनियादी सुविधाओं के साथ।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप
स्लमवासियों की समस्या पर पूर्वी भारत की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी
वास्तु विहार के सीएमडी श्री विनय तिवारी से चर्चा के आधार पर।

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