रियो जीतने के लिए विश्वास बनाए रखना नरसिंह

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Narsingh Yadav
Narsingh Yadav

नरसिंह यादव पर लगा डोपिंग का दाग धुल गया। नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने उन्हें क्लीन चिट दे दी और अब नरसिंह रियो अभियान पर हैं। नाडा ने कहा कि रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर चुके नरसिंह यादव साजिश के शिकार हुए। नाडा के महानिदेशक नवीन अग्रवाल ने माना कि नरसिंह की ओर से कोई भी गलती या लापरवाही नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि 2 जून तक उनमें कोई भी सैंपल पॉजीटिव नहीं पाया गया था, इसीलिए इस पर यकीन नहीं किया जा सकता कि एक बार प्रतिबंधित एनाबोलिक स्टेरॉयड मिथेनडायनोन की खुराक से खिलाड़ी को कोई फायदा होगा।

अच्छी बात है कि नरसिंह के बंद होते रास्ते खुल गए लेकिन डोपिंग का इल्जाम लगने के बाद से लेकर उससे बरी होने के क्षण तक उन्होंने एक-एक पल कैसे बिताये, इसका दर्द सिर्फ वो ही बता सकते हैं। डोपिंग के इल्जाम ने उनके चेहरे की हंसी के साथ-साथ साथी खिलाड़ियों पर से उनके विश्वास को भी छीन लिया। चाहे वो कवि हों, लेखक हों या दार्शनिक, हर किसी ने माना है कि भरोसे का टूटना व्यक्ति के अंदर बहुत कुछ तोड़ने का काम करता है। अपनों से ठगा गया व्यक्ति अक्सर अपना विश्वास खो देता है। जाने-अनजाने वो हर व्यक्ति को शक की नज़रों से देखने लगता है। इस घटना ने यकीनन नरसिंह को अंदर से पूरी तरह बदल दिया होगा। अब उनकी प्राथमिकतायें बदल गई होंगी। जिन साथियों के साथ वो बैठ कर अपने सुख-दुख साझा करते थे, अब वो उन्हें शक की नजरों से देखेंगे।

विश्वास एक ऐसी महीन सीमा रेखा है जिसका जब अतिक्रमण किया जाता है तो वो व्यक्ति के साथ-साथ उसके पूरे व्यक्तित्व पर अपना बुरा असर डालता है। इस पूरे घटनाक्रम में विश्वास के साथ-साथ खेल के मूल सिद्धांत ‘खेल भावना’ की भी बेरहमी से हत्या की गई। अखाड़े में एक-दूसरे को पटखनी देने की भावना ने व्यक्तिगत स्तर पर सेंधमारी कर डाली। ये स्थिति खेल के लिए किसी भी सूरत में उचित नहीं कही जा सकती।

नरसिंह यादव डोपिंग मामले ने खेल की दुनिया में पर्दे के पीछे चल रही उठा-पटक के कई दृश्यों को एक साथ सबके सामने ला दिया। ट्रेनिंग सेंटर में खिलाड़ियों की आपसी खींचतान और अफसरों की लापरवाह कार्यशैली का वो सच सबको पता चला जो अक्सर फिजांओं में तैरते-तैरते कानों में गूंजा करती थीं। ट्रेनिंग सेंटरों की ‘व्यवस्था’ का सच भी इससे सामने लाया। खिलाड़ी यहां किस तरह खुद को असुरक्षित और असहाय महसूस करते हैं, सेंटर में मिलने वाले खाने में किस हद तक मिलावट किया जाना संभव है और अधिकारी इन बातों से कितने लापरवाह हैं, ये घटनाक्रम उस सच से रू-ब-रू करवाता है।

नरसिंह यादव के साथ जो कुछ हुआ उसके बाद वरिष्ठ खिलाड़ियों ने जिस तरह ट्रेनिंग सेंटर के भोजन पर उंगलियां उठाईं उसने सारे परिदृश्य को साफ कर दिया। कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक कहा कि वो ट्रेनिंग सेंटर में बने भोजन को तो दूर वहां के पानी तक को भी पीना सुरक्षित नहीं समझते। ये वक्तव्य सारी स्थिति को बयां करने के लिए काफी है।

हम बतौर देश प्रतियोगिताओं की पदक तालिका में सबसे ऊपर आने की ख्वाहिश तो रखते हैं। लेकिन अपने खिलाड़ियों को ना तो उचित सुविधायें और ना ही आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। तिस पर से तुर्रा ये कि हम अपने ही हाथों उनके सपनों को रौंद देने का दुस्साहस भी दिखलाते हैं। पर्याप्त सुरक्षा और विश्वास की जगह हम उनके मन में संदेह और अविश्वास का वो बीज बोते हैं जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को कुंद कर देता है।

नाडा की अदालत ने भले ही नरसिंह यादव को क्लीन चिट दे दी हो, लेकिन मानवीय धरातल पर उनसे जिस विश्वास की बलि ले ली गई है वो आजीवन नरसिंह यादव के अवचेतन पर हावी रहेगा। बहरहाल, डोपिंग के कलंक से मुक्त होना नि:संदेह नरसिंह यादव के लिए एक बड़ी जीत है… सोचिए ये जीत तब कितनी बड़ी होगी जब वो रियो जीत कर आएंगे..!

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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