पारले-जी, खलता है तुम्हारा यूँ चला जाना

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Parle-G Biscuit
Parle-G Biscuit

सुबह की चाय अब फीकी लगेगी, पड़ोस की छोटी दूकान से लेकर बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर तक आँखें अनायास ही उसे ढूंढेंगी पर वो नहीं मिलेगा… जी हाँ, बचपन की यादों का एक कोना हमेशा के लिए सूना कर ‘पारले-जी’ बंद हो गया। ‘पारले-जी’, जो कहने को एक बिस्कुट था पर किसी जिगरी दोस्त से कम ना था। ना जाने कितनी एकाकियों और कितनी ही यात्राओं में साथ निभाया था उसने। पर बाज़ार के बदले समीकरणों में वो टिका ना रह पाया। पिछले महीने के आखिर में मुंबई के विले पार्ले स्थित पारले-जी की 87 साल पुरानी फैक्ट्री आखिरकार बंद हो गई। फैक्ट्री बंद होने का कारण इसके प्रोडक्शन का कम होना बताया जा रहा है।

भारत के इस सबसे मशहूर बिस्कुट का ‘पारले-जी’ नामकरण इसकी फैक्ट्री के विले पार्ले में होने के कारण हुआ था, पर ज्यों-ज्यों इसका नाम और स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ता गया, ये बिस्कुट विले पार्ले का पर्याय होता चला गया। पता नहीं इस इलाके के लोग इसकी फैक्ट्री के बंद होने को कैसे पचा पाएंगे जब सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर हम सब इसके बंद होने पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि कम्पनी प्रबंधन ने फिलहाल 10 एकड़ में फैले और 300 कर्मचारियों वाले विले पार्ले यूनिट को ही बंद करने का फैसला किया है, पर निकट भविष्य में बाकी यूनिटें भी बंद की जा सकती हैं।

बहरहाल, बता दें कि ‘पारले प्रोडक्ट्स प्राईवेट लिमिटेड’ की ओर से इस फैक्ट्री की स्थापना 1929 में हुई थी पर शुरू में यहाँ मिठाईयाँ और टॉफियाँ बनाई जाती थीं। इस बिस्कुट का उत्पादन दस साल बाद यानि 1939 में शुरू किया गया था। अपने उत्पादन के समय से ही ये बिस्कुट ग्लूकोज युक्त एनर्जी बूस्टर के तौर पर पूरे देश में जानी जाने लगी। शुरू में इस बिस्कुट को ‘ग्लूको’ नाम से बाजार में उतारा गया था। लेकिन, बाद में इसका नाम बदलकर ‘पारले-जी’ रख दिया गया। पारले-जी का ‘जी’ वैसे तो ‘ग्लूकोज’ का संक्षिप्त रूप था पर बाद में इस जी को ‘जीनियस’ से जोड़ दिया गया।

बता दें कि ‘पारले-जी’ भारत में बिकने वाला सबसे बड़ा बिस्कुट ब्रांड था। देश में बिस्कुट के 40% बाजार पर इसका कब्जा था। 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार ‘पारले-जी’ की बिक्री दुनिया के चौथे सबसे बड़े बिस्कुट उपभोक्ता मुल्क चीन से भी ज्यादा थी। भारत से बाहर ये यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा आदि में भी उपलब्ध था। ये अकेला एक ऐसा बिस्कुट था जो शहर और गांव दोनों जगह एक ही मूल्य पर बिकता था और इसकी लोकप्रियता दोनों ही जगह एक समान थी।

इस बिस्कुट की लोकप्रियता का बड़ा कारण इसका विज्ञापन का तरीका था जो 80 के दशक में सबसे अलग था। ये वो दौर था जब आम आदमी के जीवन में टेलीविजन का नया-नया प्रवेश हुआ था। टेलीविजन की चमकदार जीवन शैली जब अपने साथ विज्ञापन को भी लेकर आई तो आम भारतीय उस जादू में खो-सा गया। इसी दौर में ‘पारले-जी’ ने तकनीक के साथ नये प्रयोग किए। साल 1979 में उसने एनिमेशन के द्वारा एक छोटी-सी बच्ची की तस्वीर को अपने पैकेट पर अंकित किया। ये तस्वीर ‘पारले-जी’ की लोकप्रियता का बड़ा आधार साबित हुई। अब भी लोगों के जेहन में वो बच्ची बसी हुई है और इस आधुनिक युग में भी उस तस्वीर के एनिमेटेड होने पर किसी को यकीन नहीं आता। सोचिए इस बिस्कुट का कैसा जादू था लोगों पर।

एक नहीं, दो नहीं बल्कि तकरीबन छह पीढ़ियों को अपने मोहपाश में बांधे रखने वाले ‘पारले-जी’ को चलिए बड़े प्यार से अलविदा कहें।

पुनश्च:

कम्पनी के प्रबंधन का दावा है कि उत्पादन लगातार गिर रहा था। इसका मतलब है कि बाज़ार में कम्पनी की डिमांड गिर रही थी, जिससे उत्पादन कम हो रहा था। लेकिन बिस्कुट बाज़ार में जिस कम्पनी की तूती बोलती हो उसके लिए यह बात पचती नहीं कि बाज़ार में बिस्कुट की डिमांड कम हो रही थी। दूसरी बात ये कि क्या सिर्फ मुंबई यूनिट का उत्पादन गिर रहा था या फिर देश भर में जहाँ पारले का उत्पादन होता है, उन यूनिटों की भी यही स्थिति है? अगर दूसरी जगहों पर इस तरह की बात नहीं थी तो मुंबई में यह कैसे हो सकता है? कहीं फैक्ट्री बंद होने के पीछे रीयल स्टेट बाज़ार का दबाव तो काम नहीं कर रहा? हम इस बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि मुंबई के इस उपनगर में जमीन 25 से 30 हज़ार रुपये प्रति स्क्वायर फीट की दर से बिक रही है।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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