अतीत के झरोखे से : 2

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Sapt Matrika
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हमारे यहाँ मां दुर्गा यानि शक्ति के नौ रूप माने गए हैं लेकिन कभी आपने सोचा कि मंदिरों में शक्ति के प्रतीक रूप में रखी गई पिंडियां सात ही क्यों होती हैं? हो सकता है इस संबंध में आपने कुछ सुन रखा हो लेकिन वो सुना हुआ या तो गलत होगा या फिर सत्य के आसपास। अगर आपको इसकी सटीक और तार्किक जानकारी चाहिए तो आपको पटना संग्रहालय चलना होगा। बोल अतीत के अन्तर्गत पटना संग्रहालय के सैर के लिए शुरू किए गए अतीत के झरोखे से की इस कड़ी में आज हम इन्हीं सप्त पिंडियों के रहस्य को जानेंगे, जो असल में सप्त मातृकाएं हैं…

हम अक्सर मंदिर जाते हैं। वहां माता के पिंडी रूप की पूजा भी करते हैं। लेकिन माता के इन पिंडी रूपों के बारे में हमें ना तो कोई जानकारी है और ना ही बताने के लिए जानकार व्यक्ति उपलब्ध हैं। अक्सर यही कहा जाता है कि इनमें छह पिंडी मां दुर्गा की छह बहनें हैं और एक भाई भैंरों हैं। लेकिन माता के नौ रूपों की जगह ये पिंडियां सात कैसे हो गईं ये कोई नहीं जानता और ना ही पंडित इसके बारे में संतुष्टि भरा जवाब दे पाते हैं।

लेकिन एक जगह ऐसी है जहां इस सवाल का जवाब आखिरकार मिल ही गया। ये जगह है पटना संग्रहालय। संग्रहालय और इन पिंडियों का क्या संबंध? आप यही सोच रहे हैं ना?  तो जनाब ये पिंडियां धर्म के साथ-साथ हमारे इतिहास का हिस्सा भी हैं। इसीलिए इनके बारे में सटीक और ज्यादा सही जानकारी हमें वहीं से मिल सकती हैं।

संग्रहालय की स्टोन गैलरी में प्रवेश करने के साथ ही इन पिंडियों का रहस्य खुद-ब-खुद खुल जाता है। एक कतार में सात देवियों की मूर्तियां इस रहस्य पर से पर्दा उठाती हैं। ये मूर्तियां सप्त मातृकाओं की मूर्तियां हैं। दुर्गा सप्तशती में भी इन सप्त मातृकाओं की चर्चा है। पुराणों के अनुसार एक समय अंधड़ासुर नामक एक भयानक राक्षस उत्पन्न हुआ। उसने अपनी शक्ति से देवताओं को भी जीत लिया और स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया। उसने तीनों लोकों में अपने अत्याचारों से हाहाकार मचा दिया। अंधड़ासुर के अत्याचार से पीड़ित लोगों को मुक्ति दिलाने हेतु सभी देवताओं ने मिलकर आपस में विचार-विमर्श किया और उसके संहार के लिए सात देवताओं ने अपने-अपने रूप से एक-एक शक्ति को प्रकट किया। ब्रह्मा की शक्ति से ब्रह्माणी, विष्णु की शक्ति से वैष्णवी, शिव से माहेश्वरी, इन्द्र से इन्द्राणी, कुमार कार्तिकेय से कौमारी, विष्णु के वाराह रूप से वाराही और यम की शक्ति से चामुंडा प्रकट हुईं। ये सात शक्तियां ही सप्त मातृकाएं हैं।

इन मूर्तियों को गौर से देखने पर आप पाएंगे कि सभी मूर्तियों के साथ संबंधित देवों के चिह्न भी मौजूद हैं जो उनकी पत्नियों की मूर्तियों के साथ नहीं होते। ये प्रमाणित करता है कि ये शक्तियां अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं। जैसे भगवान् विष्णु के चक्र और गदा को वैष्णवी के हाथ में दर्शाया गया है, गरुड़ उनके पैरों में बैठा हुआ है। माहेश्वरी के हाथ में त्रिशूल और पैरों के पास सांढ़ को दर्शाया गया है। वैसे ही इंद्राणी के पास ऐरावत और वज्र दिखाया गया है। कौमारी के हाथों में भाला है और पैरों के पास मोर अंकित है। चामुंडा के हाथ में कटार, आस-पास भूत-प्रेत की सेना और पैरों में उल्लू बना है। वहीं ब्रह्माणी के हाथ में माला है और पैर के पास हंस बैठा है। जबकि वाराही के पास वाराह अवतार के शस्त्र अंकित हैं। खास बात ये कि हर शक्ति के साथ एक बच्चे की मूर्ति भी है जिससे प्रमाणित होता है कि ये सप्त मातृकायें हैं। बच्चों की मूर्तियों का प्रतीकार्थ यह है कि स्त्री मां तभी बनती है जब वो बच्चे को जन्म देती है। इस तरह ये सातों मूर्तियां एक स्त्री की शक्ति और मां के ममत्व दोनों को एक साथ दर्शाती हैं।

छठी शताब्दी की इन मूर्तियों को सरायकेला, सिंहभूम से खुदाई में प्राप्त किया गया है। काले पत्थर से बनी ये मूर्तियां मूर्तिकला का अद्भुत नमूना तो हैं ही, साथ ही ये हमें इतिहास और धर्म से जुड़ी उन बातों की जानकारी भी देती हैं जो अमूमन आम व्यक्ति नहीं जानते। कहते हैं इतिहास अपने साथ उन बंद दरवाजों को भी खोलता है जिनकी चाबियां अक्सर वर्तमान के हाथों में नहीं होतीं। तो ये वही चाबियां हैं जो हमें वर्तमान में धर्म के बदले रूप का वो ज्ञान देती हैं जो हमें मंदिरों में भी नहीं मिलता।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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