क्या इस बार भी मेंढ़क बनेंगे पटनावासी?

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Patna after heavy rain
Patna after heavy rain

चंद घंटों की बारिश और पटना की सड़कें लबालब। ये खबर प्रदेश के हर चैनल की हेडलाईन बनी हुई है। आखिर हर साल ऐसा क्यों होता है कि रोमांटिक कही जानेवाली बारिश पटना के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाती है? सड़क पर जगह-जगह पानी जम जाने से वो स्वीमिंग पूल की तरह नजर आने लगती है। कई बार तो खुले मेनहोलों और बड़े-बड़े गड्ढों में पानी भर जाने की वजह से लोग दुर्घटना के शिकार होकर मौत के मुंह में भी समा जाते हैं।

पिछले साल भी भारी बारिश की वजह से पटना की ज्यादातर सड़कें नदियां बन गई थीं। आने-जाने के तमाम रास्ते बंद हो गए थे। दूर-दूर तक गाड़ियों की लंबी लाईनें लगी हुई थीं। शहर में यातायात व्यवस्था बुरी तरह से ठप हो गई थी। लोग छाती भर पानी को पैदल पार करते हुए अपने-अपने घरों तक पहुंचे थे। बावजूद इसके सरकार का ध्यान शहर की इस नारकीय स्थिति की ओर नहीं गया।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना को लगातार मेट्रो शहर बनाने की बातें करते हैं। शहर में मेट्रो जैसी अत्याधुनिक सेवाओं की योजनायें बनाई जाती हैं। लेकिन, सड़कों पर लगने वाले जलजमाव के बारे में कोई बात नहीं की जाती। अक्सर अखबारों में ऐसी तस्वीरें आती हैं जिसमें छाती भर पानी को पार करके बच्चे स्कूल जाते दिख जाते हैं। ये तस्वीरें अगर किसी दूर-दराज जगह की होती है तो हम विकास का रोना रोने लगते हैं। लेकिन, जब ये हकीकत राजधानी पटना की होती है तो सब उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?

राजधानी में सीवरेज व्यवस्था बुरी तरह ठप है। जगह-जगह पाईपें टूटी हुई हैं। शहर की अधिकांश नालियां जाम हैं। इन सारी समस्याओं को दूर करने के लिए ना तो जल पर्षद विभाग और ना ही नगर निगम के पास कोई दूरअंदेशी योजना है। साल 2014 में नगर निगम ने एक रिसर्च के द्वारा ये साबित करने की कोशिश की थी कि मीठापुर कृषि फॉर्म में बनी बिल्डिंग की वजह से शहर के कंकडबाग एरिया में पानी की निकासी नहीं हो पाती। इसके निराकरण के लिए कई नालों और संप हाउसों को बनाने की बात की गई। नाले और संप हाउस बनाये भी गए। लेकिन, समस्या जस-की-तस बनी रही।

पटना की इस दुर्दशा का एक बड़ा कारण शहर की अव्यवस्थित तरीके से बसावट है। जगह-जगह लोगों ने नालियों को बंद कर उस पर दुकानें या घर बना लिए हैं। इसकी वजह से बरसात के पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता और वो सड़कों पर गंदगी के साथ बहता रहता है। इस गंदे पानी की वजह से कई तरह की बीमारियां फैलती हैं। लोग परेशान रहते हैं, हंगामा करते हैं और सरकारी विभाग एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलने में व्यस्त रहते हैं।

जहां तक बात शहर के नगर-निगम की है तो वो अपने कार्यों की वजह से कम और आपसी खींचतान और सिर फुटौव्वल की वजह से अधिक जाना जाता है। पिछले सात सालों में निगम सफाई उपकरणों की खरीद इसी आपसी तकरार की वजह से नहीं कर पाया। जनप्रतिनिधि भी शहर की इस कुव्यवस्था की ओर से पूरी तरह लापरवाह हैं। वो अपने कर्तव्यों की इतिश्री विधानसभा में चिल्लाकर और प्रश्न पूछकर कर लेते हैं।

उधर राज्य सरकार बेवजह आयोजनों पर करोड़ों-अरबों रूपये तो खर्च करती है। लेकिन, शहर की मामूली पर महत्वपूर्ण चीजों पर ध्यान नहीं देती। नतीजतन, आम आदमी को भारी कुव्यवस्था के बीच जीवनयापन करना पड़ता है। हर बरसात में पटनावासियों की हालत पानी के उस मेंढ़क की तरह हो जाती है जो टर्राता तो है, लेकिन उसकी आवाज कोई नहीं सुनता। देखें इस बार उसकी किस्मत बदलती है या फिर हालात जस-के-तस बने रहते हैं।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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