क्या शीला लगायेंगी कांग्रेस की नैया पार?

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Sheila Dikshit
Sheila Dikshit

यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी कमर कस ली है। राज्य में  ब्राह्मण वोटों पर पकड़ बनाने के लिए कांग्रेस ने पुराने चावल के पथ्य का सहारा लिया है। 78 साल की शीला दीक्षित पर दांव लगाकर कांग्रेस अपनी नैया पार करने के सपने देख रही है। पंजाब के खत्री परिवार में पैदा हुईं शीला दीक्षित कभी यूपी कांग्रेस के कद्दावर ब्राह्मण नेता रहे उमाशंकर दीक्षित की बहू हैं। कांग्रेस को उम्मीद है शीला दीक्षित के सहारे वो यूपी में 27 साल बाद वापसी कर पाने में सफल हो पायेगी।

शीला दीक्षित के बहाने कांग्रेस की नज़र ब्राह्मण वोटों पर है। यूपी में 10% ब्राह्मण वोट हैं। अभी तक ये वोट बैंक बसपा-भाजपा के साथ था। लेकिन, अब इसमें दरार दिख रही है। ऐसे में अगर शीला दीक्षित अपने ब्राह्मण परिवार और श्वसुर के नाम का लाभ उठाने में सफल रहीं तो कांग्रेस को इसका बड़ा फायदा हो सकता है। ब्राह्मण वोटों को अपने पक्ष में मोड़ लेने पर कायस्थ और वैश्य वर्ग के 8% वोटों की उम्मीद भी कांग्रेस कर सकती है। इन सबके साथ-साथ अगर कांग्रेस ने 39% पिछड़े और 18% मुस्लिम वोटों में भी थोड़ी सेंधमारी कर ली तो करीब 120 सीटों पर उसकी बढ़त हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में अपने कमजोर जनाधार को मजबूत करने के लिए कांग्रेस ने सोच-समझकर नये चेहरे की बजाय शीला दीक्षित जैसे पुराने चेहरे को तवज्जो दी है। इसकी एक बड़ी वजह शीला दीक्षित का अनुभव है जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रहने में मदद करता है। हालांकि, 1989 से शीला दीक्षित यूपी से नदारद रही हैं। लेकिन, फिर भी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से वो यूपी की राजनीति में मजबूत दखल रखती हैं। शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की कमान संभालती रही हैं। उनके ऊपर कई घोटालों के आरोप लगते रहे हैं। बावजूद इसके कांग्रेस आलाकमान ने हमेशा उन पर अपना विश्वास जताया है। हर हार के बाद शीला दीक्षित के कंधों पर और भी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। 1998 में वो जब लोकसभा चुनाव हारीं तो उन्हें दिल्ली में विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी सौंप दी गई। 2014 में जब वो दिल्ली विधानसभा चुनाव हार गईं तो उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया। इससे पहले वो 1986 से 1989 के बीच पीएमओ में मंत्री भी रह चुकी हैं।

उम्र और अनुभव के लिहाज से देखें तो बसपा अध्यक्ष मायावती हों, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष केशव मौर्या हों या मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव – ये सभी शीला दीक्षित से कमतर ठहरते हैं। कांग्रेस इसे अपना अहम् शस्त्र मान रही है। यूपी में कांग्रेस में आये बिखराव को संभालने में भी शीला दीक्षित का अनुभव सब पर भारी पड़ेगा। अनुभवी शीला दीक्षित अपने ‘गांधी ब्रांड’ की वजह से तालमेल बिठाने में सफल हो सकती हैं। और फिर उन्हें प्रियंका गांधी का साथ तो मिलेगा ही। ‘अनुभव’ और ‘आकर्षण’ की ये जुगलबंदी यूपी में कांग्रेस की हैसियत को मजबूत बनाने में अहम् किरदार निभा सकती है। इनके अलावे यूपी कांग्रेस के नए अध्यक्ष राज बब्बर, उपाध्यक्ष इमरान मसूद, कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी गुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का जो असर होगा वो अलग।

कुल मिलाकर शीला दीक्षित को मैदान में उतारकर कांग्रेस ने एक ऐसा दांव खेला है जो अगर सही पड़ गया तो कांग्रेस के 27 सालों के सूखे यूपी अभियान में हरियाली आ जायेगी। बहरहाल, आनेवाला वक्त ही ये तय करेगा कि शीला दीक्षित के हाथों में कांग्रेसी नाव की पतवार कितनी सलामत है। शीला दीक्षित अपनी पार्टी को डुबाती हैं या उबारती हैं इसके लिए कांग्रेस के साथ-साथ हमें भी थोड़ा इंतजार करना होगा।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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