हमें भी कुछ कहना है!

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Women at Workplace
Women at Workplace

बिहार में तेजी से कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। ये कामकाजी महिलायें 24 घंटे में से 9 से 10 घंटे अपने कार्यस्थल पर बिताती हैं। देखा जाये तो अपने दिन का अधिकतर वक्त इनका कार्यालय में ही बीतता है। बावजूद इसके कार्यस्थलों पर महिला कर्मचारियों की सुख-सुविधाओं का ख्याल ना के बराबर रखा जाता है।

राज्य की तो छोड़िये राजधानी पटना तक के अधिकतर कार्यालयों का यही हाल है। यहां महिला कर्मचारियों के लिए ना तो अलग शौचालय की व्यवस्था है और ना ही उनकी महिलाजनित समस्याओं के लिए कोई अन्य सुविधायें। कार्यालयों में अधिकतर पुरुष कर्मचारियों के होने की वजह से महिला कर्मचारियों की समस्याओं की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता और महिला कर्मचारी भी शर्म और संकोच की वजह से कुछ नहीं कह पातीं।

प्रकृति ने पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग बनाया है। इसीलिए उनकी जरुरतें भी अलग-अलग हैं। लेकिन, इन जरुरतों का ध्यान नहीं रखने की वजह से कार्यस्थल पर महिलाओं को मानसिक तनाव के मुश्किल दौर से हर दिन गुजरना पड़ता है।

दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के कार्यालयों में महिलाओं की समस्यायें पटना की अपेक्षा बेहद कम हैं। इसका कारण वहां के कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की उपस्थिति का बड़ी संख्या में होना तो है ही, साथ ही महिलाओं की मुखरता भी इसकी बड़ी वजह है। इसी कारण से उनकी हर मुश्किल को कार्यालय में समझा जाता है। वहां उनके लिए ना सिर्फ अलग शौचालय की व्यवस्था की जाती है। वरन् उनके ‘मुश्किल भरे दिनों’ के लिए भी कई रियायतें होती हैं। साथ ही कार्यालयों में उनकी जरूरत के सामान भी मौजूद होते हैं जो इमरजेंसी में कुछ मूल्य चुकाकर आसानी से वो इस्तेमाल कर पाती हैं। इससे महिला कर्मचारी बेफिक्र होकर बिना किसी मानसिक दबाव के कार्यालयों में घंटों काम कर पाती हैं।

जबकि पटना जैसे छोटे शहरों में स्थिति इसके ठीक उलट है। यहां पुरुष और महिलाओं के बीच की खाई बेहद गहरी है। कार्यस्थल पर एक साथ कार्य करने और कई घंटे साथ बिताने के बावजूद भी उनके बीच एक दूरी होती है। वो खुलकर पुरुष अधिकारियों के सामने अपनी समस्यायें नहीं रख पातीं। इसकी वजह यहां कार्यालयों में महिलाओं का कम संख्या में होना है। दूसरी बड़ी वजह यहां के कार्यालयों की ढीली-ढाली व्यवस्था है।

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पटना के कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की सुविधाओं का कोई ख्याल नहीं रखा जाता। उनके लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं होती। जिसकी वजह से महिला कर्मचारी इनमें जाने से हिचकती हैं। कई बार तो वो पूरे-पूरे दिन शौचालय का इस्तेमाल नहीं करतीं। जिससे उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। यहां के शौचालयों में सफाई की व्यवस्था भी नहीं के बराबर रहती है। जिससे महिला कर्मचारियों को ईकोलाई जैसी बीमारियां आसानी से जकड़ लेती हैं।

इस ढीली-ढाली, लचर स्थिति का कारण ‘सब चलता है यार’ जैसी मनोवृत्ति है। यहां आज भी लोग ‘प्रोफेशनल’ नहीं हैं जिसकी वजह से समस्यायें जस-की-तस बनी हुई हैं। मेट्रोपॉलिटन शहर का दर्जा पाने की ख्वाहिश रखने वाले पटनावासियों को अगर शहर में बेहतर कार्य का माहौल बनाना है तो उन्हें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी। उन्हें महिला कर्मचारियों की उन सारी सुविधाओं का ख्याल रखना होगा जो बड़े शहरों के कॉरपोरेट ऑफिसों में दिया जाता है। तभी कार्यस्थल पर महिलायें मानसिक संताप से मुक्त होकर बेहतर तरीके से कार्य कर पायेंगी और शहर तरक्की की राह पर चल सकेगा।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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