ढाका हमला और तस्लीमा के तीखे सवाल

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Taslima Nasreen
Taslima Nasreen

अपने निर्भीक लेखन के लिए दुनिया भर में खास पहचान रखने वाली बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ट्विटर के माध्यम से ढाका हमले को लेकर कई अहम सवाल उठाए हैं। ढाका के हमलावरों को लेकर उन्होंने सीधा सवाल किया कि मीडिया उन्हें ‘गनमैन’ क्यों लिख रहा है? उन्हें ‘इस्लामी आतंकी’ क्यों नहीं कहा जा रहा? उन्होंने लोगों को मारने और उनमें दहशत फैलाने से पहले ‘अल्लाहू अकबर’ का नारा लगाया था। क्या उन्हें ‘इस्लामी आतंकी’ नहीं कहा जाना चाहिए था?

तस्लीमा ने इस तर्क को भी खारिज किया कि गरीबी किसी को आतंकवादी बना देती है। तस्लीमा ने अपने ट्वीट में लिखा कि ढाका हमले का आतंकी निब्रस इस्लाम तुर्की होप्स स्कूल, नार्थ साउथ और मोनाश यूनिवर्सिटी में पढ़ा था। उसका ब्रेन वॉश इस्लाम के नाम पर किया गया और वह आतंकी बन गया। ढाका हमले के सभी आतंकी अमीर परिवार से थे और सभी ने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी। कृपया यह मत कहिए कि गरीबी और निरक्षरता लोगों को इस्लामिक आतंकवादी बनाती है – “All Dhaka terrorists were from rich families, studied in elite schools. Please do not say poverty & illiteracy make people Islamic terrorists.”

तस्लीमा ने आगे बड़ी बेबाकी से कहा कि इस्लामिक आतंकवादी बनने के लिए गरीबी, निरक्षरता, तनाव, अमेरिकी विदेश नीति और इस्राइल की साजिश की जरूरत नहीं है। आपको इस्लाम की जरूरत है। ढाका की नृशंस घटना से आहत तस्लीमा ने यहाँ तक कहा कि इस्लाम को शांति का धर्म कहना बंद करें – “For humanity’s sake please do not say Islam is a religion of peace. Not anymore.”

बता दें कि बीते शुक्रवार को आतंकियों ने ढाका के एक रेस्टोरेन्ट में हमला कर 20 विदेशी नागरिकों की हत्या गला रेतकर कर दी थी जिनमें भारत की बेटी तारिषी जैन भी शामिल थी। गौरतलब है कि इन हमलों की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आइएस) और अलकायदा ने ली है और इस लोमहर्षक घटना के पीछे जिन दो स्थानीय आतंकी संगठनों का हाथ होने की बात कही जा रही है उनमें से एक ‘अंसार-अल-सलाम’ को अलकायदा का समर्थन प्राप्त है और दूसरा ‘जमात-उल-मुजाहिद्दीन’ आइएस से जुड़ा हुआ है। वैसे  बांग्लादेश के अनुसार इस नृशंस घटना को अंजाम देने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी शामिल है।

यह भी जानें कि पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में धार्मिक चरमपंथियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है। लेखकों, प्रकाशकों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वहाँ काम कर रहे विदेशी मूल के लोगों पर लगातार हमले हो रहे हैं। बीते दो दिनों में ही दो हिन्दू पुजारियों पर भी हमला हुआ और एक पुजारी की हत्या भी कर दी गई। दुख और हैरत की बात तो यह है कि ये सब कुछ ‘इस्लाम’ के नाम पर हो रहा है। क्या ‘इस्लाम’ की इससे बड़ी तौहीन भी कुछ हो सकती है?

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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