अतीत के झरोखे से : 1

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Didarganj Yakshini
Didarganj Yakshini

बोल बिहार में बोल अतीत के अन्तर्गत पिछली बार हमने पटना संग्रहालय से आपको रू-ब-रू कराया था। अब इसके भीतर की सैर के लिए हम आज से शुरू कर रहे हैं – अतीत के झरोखे से’… इस कड़ी में सबसे पहले मिलते हैं दीदारगंज की यक्षिणी से…

पटना संग्रहालय में घुसने के बाद दांयें मुड़ते ही आर्ट गैलरी में दूर से ही यक्षिणी की सफेद मूर्ति दिखाई पड़ जाती है। ये मूर्ति पटना संग्रहालय का मास्टर पीस मानी जाती है। पूरी दुनिया में ये अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है। कहते हैं इसकी खूबसूरती के आगे पिकासो की मोनालिसा की पेंटिंग भी फीकी पड़ जाती है। दुनिया भर से लोग इसे देखने यहां आते हैं। पटना के दीदारगंज से प्राप्त चामरधारिणी यक्षिणी की ये प्रतिमा सौंदर्य की अभिव्यक्ति, आकृति की पूर्णता और कला की सूक्ष्मता का अद्वितीय संगम है। इस मूर्ति की बायीं बांह यूं तो खंडित हो गई है, लेकिन इससे इसकी खूबसूरती पर कोई असर नहीं पड़ा है। मूर्ति के दांयें हाथ में चामर है। ये मूर्ति स्त्री सौंदर्य के साथ-साथ मातृत्व का भी आदर्श रूप है।

मौर्य काल के प्रस्तर शिल्प से बनी इस मूर्ति की विशेषता इसकी ओपदार चमक है। कई सदी के बाद भी इस मूर्ति की चमक ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। इसे चुनार पत्थर से बनाया गया है। चुनार पत्थर यूपी के मिर्जापुर में पाया जाता है। उसे तराश कर मूर्तियां बनाई जाती हैं। इस पर जो पॉलिश है उसे मौर्यन पॉलिश कहा जाता है। 2300 साल जमीन के अंदर रहने के बाद भी इन पत्थरों की चमक मौर्यन पॉलिश की वजह से ही ज्यों-की-त्यों बरकरार है। यही पत्थर अशोक द्वारा बनवाये पिलर में सारनाथ, वैशाली और कुम्हरार में हमें देखने को मिलता है। मौर्य काल की सारी मूर्तियां इसी पत्थर से बनाई जाती थीं।

कलाकार ने यक्षिणी की इस मूर्ति में अपनी सारी कल्पना निचोड़ दी है। इतिहास के पन्नों में गुम हो गए उस अंजान कलाकार ने जितनी लगन से इसे बनाया है वो देखते ही बनता है। स्त्री शरीर की एक-एक बारीकी को मूर्ति में बड़ी ही खूबसूरती से उकेरा गया है। यक्षिणी की इस मूर्ति के बालों को बहुत ही कलात्मक ढंग से बांधा गया है। स्कार्फ से जो बाल निकल गए हैं वो लटें चेहरे पर बिखरी हुई हैं। स्कार्फ के ऊपर मोतियों की लड़ी लटकी हुई है। मूर्ति के दायें कंधे से होते हुए दुपट्टा उसके दांये हाथ में अटका हुआ है।

160 सेंटीमीटर की इस मूर्ति को उस समय के प्रचलित सारे आभूषण पहनाये गये हैं। कानों में कुंडल, हाथ में कड़ा, माथे पर मांगटीका, ये सारे आभूषण मौर्य काल के इतिहास की समृद्धि को दर्शाते हैं। उस काल में जो मूर्तियां बनाई जाती थीं वो ‘राउंड ऑफ फिगर’ होती थीं। मतलब आगे के साथ-साथ मूर्ति के पीछे के भाग का भी अंकन किया जाता था। ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय मंदिरों का विकास नहीं हुआ था। अगर उस वक्त मंदिरों का विकास हुआ होता तो मूर्ति दीवार से सटाकर रखी जाती और उसके पीछे के भाग को अंकित नहीं किया जाता। मंदिरों का विकास मौर्य काल के 600 साल बाद गुप्त काल में छठी शताब्दी में हुआ था।

ये मूर्ति स्त्री के तीन भावों को व्यक्त करती है। वे भाव हैं सौंदर्य, मातृत्व और सेवा भाव। नारी सौंदर्य को अभिव्यक्त करती दुनिया की ये सबसे अनुपम मूर्ति है। मूर्ति के पेट पर महीन लकीरें हैं जो प्रसव के बाद महिलाओं के पेट पर बन जाती हैं और मातृत्व को बयां करती हैं। यक्षिणी के वक्ष उन्नत और उठे हुए हैं जो मातृत्व काल में दूध से भरे होने की वजह से दिखाई देते हैं। इसके दायें हाथ में चामर है जो सेवा भाव को दर्शाता है। दायां पांव हल्का सा उठा हुआ है जो ये बताता है कि चामर को डुलाया जा रहा है, क्योंकि जब हम कोई काम किसी खास अंग से करते हैं तो उस पर दबाव बन जाता है, जो इस मूर्ति में स्पष्ट दिखाई देता है। महीन बारीकियों से बनी यक्षिणी की ये मूर्ति कला का उत्कृष्ट नमूना है। मूर्ति का एक-एक ‘कट’ मूर्तिकार की कलात्मकता, लगन और उसकी पारखी नजरों को बयां करता है।

इस मूर्ति के मिलने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। दीदारगंज घाट पर गंगा किनारे अक्सर धोबी एक पत्थर पर कपड़े धोते थे। 18 अक्टूबर 1917 में बाढ़ आने की वजह से गंगा का पानी बहुत बढ़ गया था। एक धोबिन सिर पर कपड़ों का गट्ठर और गोद में बच्चे को लिए हुए वहां पहुंची। उसने बच्चे को पत्थर के एक कोने के ऊपर बिठा दिया और खुद दूसरे कोने पर कपड़े धोने लगी। तभी एक सांप इस मूर्ति की बगल में घुस गया। कहीं बच्चे को सांप ना काट ले ये सोचकर धोबिन ने शोर मचाया। उसे सुनकर सारे लोग इकट्ठा हो गए और सांप को पकड़ने के लिए पत्थर को पलट दिया। जब पत्थर पलटा गया तो सब भौंचक्के रह गए। वो पत्थर यक्षिणी की मूर्ति निकली। तुरंत इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को दी गई और 17 दिसंबर 1917 को ये मूर्ति पटना म्यूजियम लाई गई। आज ये मूर्ति देश-विदेश में अपनी कलात्मक संरचना और सौंदर्य की अनोखी कृति के रूप में जानी जाती है।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

 

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