हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन

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Baba Nagarjun
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प्रगतिशील आन्दोलन यानि प्रगतिवाद के पुरोधा कवि हैं वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ अर्थात् बाबा नागार्जुन। मूलत: प्रगतिवादी होने के बावजूद नागार्जुन प्रयोगशील भी हैं और डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में उनकी काव्य-कला को नई कविता के संदर्भ में देखा है। कहने का मतलब यह कि नागार्जुन का ‘फैलाव’ प्रगतिवाद से लेकर नई कविता तक है और ये बात जितनी सच है उतना ही सच यह है कि अब उनके बाद आने वाला कविता का कोई भी ‘युग’ और ‘वाद’ उनकी बात किए बिना अधूरा होगा।

बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी ग्राम में 30 जून 1911 को हिन्दी के इस आधुनिक कबीर का जन्म हुआ था। स्वभाव से जैसे आवेगशील और जीवंत थे नागार्जुन वैसी ही थी उनकी कविता। जो वस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही नागार्जुन की कविता की रचना-भूमि है। इस दृष्टि से काव्यात्मक साहस में वे अप्रतिम हैं। उन्हीं की कविता में एक मादा सूअर ‘मादरे हिन्द की बेटी’ बन सकती थी और उन्हीं की बीहड़ प्रतिभा ‘कटहल के छिलके जैसी जीभ’ को देख सकती थी जिससे ‘दरिद्रता’ लहू चाटा करती है।

नागार्जुन की यही कल्पना रिक्शा खींचने वाले, फटी बिवाइयों वाले, गुट्ठल घट्टों वाले, कुलिश कठोर खुरदरे पैरों के चित्र भी आँकती है और एक श्रमजीवी की पीठ पर फटी बनियाइन के नीचे “क्षार-अम्ल, विगलनकारी, दाहक, पसीने का गुण-धर्म” बतलाती है। डॉ. नामवर सिंह ने बिल्कुल सही रेखांकित किया है कि मनुष्य के ये वे रूप हैं जो नागार्जुन ना होते तो हिन्दी कविता में शायद ही आ पाते।

नागार्जुन की कविता में अपने समय और समाज का वर्तमान सबसे अधिक मौजूद है – अपनी पूरी विविधता, सम्पूर्णता और जटिलता के साथ। लेकिन उसमें केवल वर्तमान और उसकी तात्कालिकता ही नहीं है बल्कि परम्परा की स्मृतियां और उसकी अनुगूंजें भी हैं। इसीलिए जब वे ‘कालिदास सच-सच बतलाना’ और ‘बादल को घिरते देखा है’ जैसी कविताएं लिखते हैं तो एक आधुनिक कवि की दृष्टि से परम्परा की स्मृति की पुनर्रचना करते हैं। कविता ‘इमिडियेट’ भी होती है, ‘कन्टेम्प्ररी’ भी होती है और ‘मॉडर्न’ भी – ये बाबा से बेहतर कोई नहीं बता सकता।

नागार्जुन सच्चे अर्थों में जनकवि हैं। वे जनता के साथ अपनी निकटता को एक काव्य-मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने बड़ा स्पष्ट कहा है – “जनता मुझसे पूछ रही है –/ क्या बतलाऊँ/ जनकवि हूँ, मैं साफ कहूँगा/ क्यों हकलाऊँ?” सचमुच कहीं नहीं हकलाते नागार्जुन। ‘प्रेत का बयान’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘गांधीजी के तीन बंदर’, ‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’ जैसी कविताएं इसका सबूत हैं। व्यंग्य की विदग्धता ने इन कविताओं को कालजयी बना दिया है और कहने की जरूरत नहीं कि उसके मूल में एक जनकवि की प्रतिबद्धता है।

नागार्जुन की कविता में प्रेम भी सामाजिक संदर्भों से कटा हुआ नहीं है। वह अपने परिवेश समेत कविता में उपस्थित रहता है। अपनी एक कविता में कवि घोर निर्जन परिस्थिति में पड़ा हुआ अपनी पत्नी को याद करता है और इस स्मृति से जुड़ी हुई जो स्मृतियां आती हैं वे हैं ‘तरउनी ग्राम’, ‘लीचियां और आम’, ‘मिथिला के रुचिर भू-भाग’, ‘धान’ और ‘रूप-गुण अनुसार ही रक्खे गए नाम’। इन सबके मध्य उन्हें याद आता है ‘सिन्दूर तिलकित भाल’। इस तरह नागार्जुन अपने गाँव, अपने सांस्कृतिक और प्राकृतिक परिवेश से अलग अपनी पत्नी की भी कल्पना नहीं कर सकते।

नागार्जुन का केवल ‘कंटेट’ ही नहीं कहने का तरीका भी अपना था। 5 नवंबर 1998 को ‘विदा’ होने तक इस ‘यात्री’ ने कविता में रूप संबंधी जितने प्रयोग अकेले किए हैं उतने शायद ही किसी ने किए हों। कविता की उठान और नाटकीयता में तो वे लाजवाब ही हैं। उनकी जैसी सिद्धि छन्दों में है वैसा ही अधिकार मुक्त छन्द की कविता पर भी है। उनके बात करने के हजार ढंग हैं और भाषा में बोली के ठेठ स्तरों से लेकर संस्कृत की संस्कारी पदावली तक इतने स्तर हैं कि कोई भी अभिभूत हो सकता है।

नागार्जुन की कविताओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे ‘कलात्मक’ होने के साथ ही लोकप्रिय भी हैं। इस बात में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि तुलसीदास के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता की पहुँच किसानों की चौपाल से लेकर काव्यरसिकों की गोष्ठी तक है। हिन्दी ही नहीं मैथिली, संस्कृत और बंगला में भी समान रूप से कविता करने वाले बाबा नागार्जुन हमारी जीवंत परम्परा और भारतीय जनता के साहसी अभियान के प्रतीक और स्वाधीन भारत के प्रतिनिधि जनकवि हैं।

बोल बिहार के लिए रूपम भारती   

 

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