फ्लाईओवर के नीचे भी है जिंदगी

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A lady with her child under Bahadurpur Flyover, Patna
A lady with her child under Bahadurpur Flyover, Patna

आपको पता है कि जिंदगियां फ्लाईओवरों के नीचे भी होती है? नहीं, तो आईये आज हम आपको जीवन के इन्हीं अलग-अलग रंगों से रू-ब-रू करवाते हैं। पटना के राजेन्द्र नगर और बहादुरपुर इन दो इलाकों को जोड़ने वाले पुल के नीचे कई जिंदगियां अपनी सांसें लेती हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं बहादुरपुर फ्लाईओवर की। हर रोज इस इलाके से हजारों लोग गुजरते हैं। कुछ गाड़ियों से तो कुछ पैदल। लेकिन, इन लोगों की जिंदगियों में झांकने की फुर्सत किसी को नहीं होती। आखिर ये लोग हैं कौन?

ये वो हैं जो पन्नियों के घरों में रहते हैं। मौसम की हर मार को चुपचाप झेलते हैं। गर्मी की तेज धूप, जाड़े की ठंढ़ी हवा और बरसात की तेज बारिश भी इन्हें घुटने टेकने को मजबूर नहीं कर पाती। हर दुख, कष्ट को सहकर कर्मठता के साथ ये जीते हैं। स्थितियां कितनी भी विपरीत हो, ये कभी हार नहीं मानते। ये वो बहादुर हैं जो बाधाओं का डटकर मुकाबला करते हैं। ताउम्र इनका साबका उन मुश्किलों से रोज होता है जिसे हम एक पल को भी नहीं सह पाते। लेकिन, इन तमाम जद्दोजहद के बाद भी इऩकी जिंदगी बेहतर कभी नहीं बन पाती।

ये लोग सरकारें बनाते हैं, उन्हें सत्ता के शिखर तक पहुंचाते हैं। लेकिन, सत्ता इन्हें कभी नहीं अपनाती। हर पांच साल पर सरकारें आती हैं, जाती हैं। पर, इनकी समस्यायें जस-की-तस रहती हैं। ये खानाबदोशों की तरह जीते हैं और लावारिसों की तरह मर जाते हैं। इनके पास न तो राशन कार्ड होता है, न बीपीएल कार्ड और न ही अन्य कोई सुविधायें। पीने का पानी तक इन्हें मयस्सर नहीं होता। शौचालय, बिजली की सुविधायें तो दूर की बात है। फ्लाईओवर के सामने बने गड्ढ़े के गंदे पानी में ये कपड़े भी धोते हैं, नहाते भी हैं और शौचालय भी जाते हैं। इनके बच्चे भूखे-नंगे घूमते रहते हैं। अभाव की जिंदगी इन्हें भिक्षावृत्ति की ओर लेकर जाती है। जहां से कई बार वो अपराध की दुनिया में उतरते चले जाते हैं।

इनके पुनर्वास के लिए सरकार के पास नीतियां और योजनायें तो हैं। लेकिन, उनके कार्यान्वयन के लिए वक्त नहीं है। तभी तो सालों गुजर जाने के बाद भी ये यहीं के यहीं हैं। इनकी तकलीफें उन राजनेताओं को नहीं दिखतीं जो हर पांच साल पर इनसे वोट मांगने आते हैं और ‘दलित’ राजनीति कर अपनी हैसियत चमकाते हैं। नेताओं की अनदेखी, सरकारी व्यवस्था का ढ़ुलमुल रवैया और अफसरों की उपेक्षा की वजह से फ्लाईओवरों के नीचे ही इनकी जिंदगी गुजर जाती है। सरकार ठान ले और इनके हालात न सुधरें, ऐसा कभी हो नहीं सकता। लेकिन, दृढ़ संकल्पशक्ति की कमी और स्वार्थपरता के कारण राजनेता पूरी लगन से काम नहीं करते। नतीजतन, सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आता और समस्यायें यथावत बनी रहती हैं।

फ्लाईओवरों के नीचे रहने वाले इन लोगों के जीवन-स्तर में सचमुच में कोई सुधार लाने का प्रयास अगर सरकार करना चाहती है तो सबसे पहले उसे इनके पुनर्वास के लिए कार्य करना होगा। उसके बाद अगला कदम इनकी शिक्षा और समुचित रोजगार के लिए उठाना होगा। तभी पुलों के नीचे रहने वाली इन जिंदगियों के चेहरे पर उम्मीद भरी मुस्कान खिल सकेगी और ये अपने राज्य और देश की तरक्की में कदम-से-कदम मिलाकर चल पायेंगे।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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