राजपूत-मुगल शैली से बना है पटना संग्रहालय

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Patna Museum
Patna Museum

अक्सर हम अपने आसपास बिखरे अतीत से अनभिज्ञ होते हैं। उदाहरण के लिए पटना के प्रसिद्ध संग्रहालय को ही लें। शहर के बीचों-बीच स्थित इस संग्रहालय के बारे में स्थानीय लोगों को भी ज्यादा नहीं पता। तो क्यों ना आज पटना संग्रहालय के भव्य इतिहास से रू-ब-रू हुआ जाय?

साल 1912 के पहले बिहार, बंगाल और उड़ीसा तीनों राज्यों को मिलाकर इस क्षेत्र को बंगाल प्रेसीडेंसी के नाम से जाना जाता था। उस वक्त इस राज्य में एक ही संग्रहालय था जो इंडियन म्यूजिम, कलकत्ता के नाम से जाना जाता था। उस वक्त जो भी पुरावशेष प्राप्त होते थे उसे इसी म्यूजियम में रखा जाता था। इस म्यूजियम की स्थापना 1814 में की गई थी।

जब 1912 ईस्वी में बिहार और उड़ीसा बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग हो गए। उसी समय बिहार के पटना स्थित कुम्हरार में डॉ. डी. वी. स्पूनर के नेतृत्व में पुरातात्विक उत्खनन का कार्य चल रहा था। इस उत्खनन में कई पुरावशेष प्राप्त हुए। इन्हें रखने के लिए डॉ. स्पूनर को एक जगह की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से पुरावशेषों को स्थान देने की मांग की। उनकी इस मांग पर बिहार एवं उड़ीसा के प्रथम लेफ्टिनेंट गर्वनर जनरल सर स्टुअर्ट बेली ने अपने आवास पर 20 जनवरी 1915 को विद्वानों की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के द्वारा एक संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव दिया गया। जिसे सबने सर्वसम्मति से पारित किया।

सन् 1917 ईस्वी को तत्कालीन बिहार एवं उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गर्वनर जनरल सर एडवर्ड गेट ने एक स्थानीय संग्रहालय की स्थापना पटना उच्च न्यायालय के उत्तरी उपांग में किया। परन्तु, पुरावशेषों की बढ़ती संख्या की वजह से कुछ ही दिनों बाद ये स्थान छोटा पड़ने लगा। तब सरकार ने संग्रहालय के लिए 700 X 500 वर्गफीट जमीन पटना-गया मार्ग पर (बुद्ध मार्ग के पश्चिम तथा इलाहाबाद बैंक के उत्तर) आवंटित की। जिसके बाद उस जमीन पर संग्रहालय के भवन निर्माण का कार्य शुरू हुआ। भवन निर्माण कार्य 1928 के दिसम्बर महीने में संपन्न हुआ।

पटना संग्रहालय का ये भवन स्थापत्य कला के बेजोड़ समन्वय को दर्शाता है। इसे मुगल-राजपूत शैली (इंडो-सारसैनिक) में बनाया गया है। इसकी परिकल्पना श्री रायबहादुर विष्णु स्वरूप ने तैयार की थी। 6 मार्च 1929 को इस भवन को संग्रहालय को सौंपा गया और 7 मार्च 1929 को ये संग्रहालय बिहार एवं उड़ीसा के तत्कालीन गर्नर जनरल सर ह्यूज स्टिफेन्स के द्वारा आम लोगों को समर्पित कर दिया गया। इसी के साथ पटना संग्रहालय कलकत्ता म्यूजिम के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा संग्रहालय बन गया।

वर्तमान में पटना संग्रहालय में कुल 17 दीर्घाओं में पुरावशेषों/कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। ये संग्रहालय बहुद्देशीय है। संकलित पुरावशेष/कलाकृति अलग-अलग प्रकृति के होने के कारण अलग-अलग दीर्घाओं में प्रदर्शित हैं। इनमें प्रस्तर प्रतिमा, मृण्मूर्तियां, अभिलेख, कांस्य प्रतिमा, चित्रकला, प्राकृतिक इतिहास, अस्त्र-शस्त्र, डेनियल प्रिंट, देशी-विदेशी साज-सज्जा, विभिन्न प्रकार के खनिज प्रस्तर, महापंडित राहुल सांकृत्यायन की सामग्री (थंका एवं पांडुलिपि), डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सामानों के साथ-साथ बुद्ध के अस्थि कलश को भी प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में लगभग 80,000 पुरावशेषों एवं कलाकृतियों का संग्रह है। इनमें से मात्र 10 प्रतिशत पुरावशेष प्रदर्शित हैं। शेष पुरावशेषों को रोटेशन पर प्रदर्शित किया जाता है।

पटना संग्रहालय अपने प्रदर्शों के माध्यम से मानव सभ्यता के क्रमिक विकास को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करता है। ये अतीत के उत्कृष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति की भी झलक प्रस्तुत करता है। इसे उच्च शिक्षा संस्थान और ज्ञान केन्द्र के रूप में भी जाना जाता है। देश-विदेश से कला, साहित्य एवं इतिहास के छात्र यहां शोध करने के लिए आते हैं। अगर भारत के इतिहास, भारतीय कला, साहित्य और जीवन को जानना हो तो इससे बेहतर स्थान कोई भी नहीं है। अतीत के अद्वितीय संग्रह की वजह से पटना संग्रहालय की गणना देश के विशिष्ट संग्रहालयों में होती है।

तो देखा आपने। आपके अपने शहर में समृद्ध इतिहास जीवंत खड़ा है जहां दूसरे देश से लोग हर दिन अपने ज्ञान का भंडारण करने आते हैं। तो आप भी इस छुट्टी में पटना संग्रहालय की सैर एक नये नजरिये के साथ कीजिए और अपने साथ जानकारी का अद्भुत खजाना वापस लेकर लौटिये।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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