संवेदनशीलता की मौत

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Our Tme without Sentiments
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इंदौर के जिला अस्पताल में तीन दिन की बच्ची की टीका लगने के बाद मौत हो गई। डॉक्टर पोस्टमार्टम के लिए एक-दूसरे पर मामला फेंकते रहे और उधर मर्च्यूरी में बच्ची के शव को चींटियां खाती रहीं। बच्ची के बेबस माता-पिता डॉक्टरों के आगे पोस्टमार्टम के लिए गिड़गिड़ाते रहे। लेकिन, ‘शैतान डॉक्टरों’ के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद नवजात के शव का पोस्टमार्टम 5 बजे शाम में जाकर संपन्न हुआ।

इस खबर ने ये तो साबित कर दिया कि वर्तमान दौर में हम सब अपनी संवेदना खो चुके हैं। संवेदनशीलता मर चुकी है और हम सांस लेने वाली मशीनों में तब्दील होते जा रहे हैं। एक ऐसे दौर में हम जीये जा रहे हैं जहां नैतिकता, मूल्य और सिद्धांत कब के खत्म हो चुके हैं। मुट्ठी भर संवेदना बची थी उसे भी हमने तिरोहित कर दिया है। ये घटना मानवीयता की मृत्यु होने के साथ-साथ और सरकारी कार्यालयों में बरती जा रही लापरवाही को भी उजागर करती है। बात चाहे इंदौर की हो या चाहे भोपाल की, बिहार की हो या मुंबई की। कमोबेश यही हालत पूरे हिन्दुस्तान की है। सरकारी नौकरियों में पदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी को भूला चुके हैं। उनके लिए कर्तव्य से ज्यादा महत्व कुर्सी का हो गया है। ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारी हो या गेट पर बैठा दरबान सबके सब सरकारी ठसक से लबरेज नजर आते हैं। इनसे सीधे मुंह बात करने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। ऐसे में आम लोग इन्हें कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नजर नहीं आते। जाहिर है जब इंसान कीड़े-मकोड़े नजर आने लगें तो उनके साथ किया जानेवाला बर्ताव भी जानवरों सरीखा ही होगा।

बहरहाल, इस सारे मामले में डॉक्टरों की भूमिका ने उनके पाक पेशे पर दाग लगाया है। हाल के वर्षों में डॉक्टरों के सेवाभाव में जिस तरह से ह्रास आया है, ये घटना उसकी पुष्टि करती है। देश भर में आये दिन डॉक्टरों की लापरवाही के मुद्दे उठते रहते हैं। दरअसल, इस मानवीय पेशे में प्राईवेट प्रैक्टिस से अकूत कमाई का ऐसा रास्ता निकला है जिसने डॉक्टरों को बदनाम कर दिया है। आज क्लीनिक में वो सारे धंधे किए जाने लगे हैं जिन्हें कभी पाक नजरों से नहीं देखा जाता।

कभी वो दिन भी थे जब डॉक्टरी को सबसे पवित्र कार्य माना जाता था। डॉक्टरों की समाज में खूब इज्जत होती थी। उन्हें डॉक्टर साहब कहा जाता था। लोगो में डॉक्टरों के प्रति लगाव और विश्वास की भावना थी। लेकिन आज उसकी जगह अविश्वास ने ले ली है। लोग ऊंची फीस देकर डॉक्टरों के पास जाते तो हैं। लेकिन उनके मन में डॉक्टरों के लिए न तो सम्मान की भावना होती है और न ही भरोसा होता है। इलाज कराना मजबूरी होती है सो मरीज कराते हैं।

सच तो यह है कि आज मरीज और डॉक्टर के बीच अपनापे का नहीं व्यवसाय का रिश्ता होता है। आज के भौतिकतावादी समाज में मूल्य गिर रहे हैं, संवेदनायें मर रही हैं और पैसे का भाव बढ़ रहा है। नतीजतन, डॉक्टरी के पेशे के साथ-साथ मानवीयता भी शर्मसार हो रही है। इंदौर की घटना तो उदाहरणमात्र है। ऐसी कितनी ही घटनाएं रोज घटती हैं और डॉक्टरी के सम्माननीय पेशे, मानवीयता और संवेदनशीलता के साथ-साथ समाज को भी कटघरे में खड़ा करती हैं। ऐसी घटनाएं समाज को अपने स्वरूप पर पुर्नविचार करने को ललकारती हैं। अगर संवेदनहीनता इस स्तर तक उतर जाती है तो ये किसी भी सभ्य समाज के लिए डूब कर मर जाने की बात है।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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