उड़ता पंजाब ने क्यों उड़ा दी नींद ?

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Udta Punjab
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भले ही पंजाब को उड़ने के लिए पंख मिले या ना मिले। लेकिन, निर्माता अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ ने सेंसर बोर्ड के साथ-साथ राजनीतिक दलों की भी नींदें उड़ा दी हैं। दरअसल, उड़ता पंजाब एक ऐसे विषय को लेकर बनाई गई फिल्म है जिसे आम लोगों की नज़रों से हमेशा दूर रखा गया। अब जब इस फिल्म के जरिये कई नए खुलासे हो रहे हैं तो बहुत सारे लोगों को इस पर आपत्ति होने लगी है।

पंजाब में नशे का व्यापार किस हद तक अपनी जड़ें जमा चुका है, इसे आधार बना कर निर्देशक अभिषेक चौबे ने बड़ी ईमानदारी के साथ एक फिल्म बनाई है। वहां बच्चों को सुलाने के लिए किस तरह अफीम चटाया जाता है ये कहानी हम सबने कभी-न-कभी सुनी है। ये फिल्म उस कहानी की तस्दीक करती है। फिल्म देखने के बाद एक बात तो पूरी तरह साफ हो जाती है कि इसे बनाने से पहले अच्छा-खासा रिसर्च किया गया है। बिना किसी तथ्य के इतनी साफगोई के साथ कहानी पेश की ही नहीं जा सकती।

आंकड़ें बताते हैं कि पिछले पांच साल में पंजाब में 1580 किलो हेरोईन, 8400 किलो अफीम और 1500 किलो अफीम डोडा चूरा (पोस्ता चूरा) पकड़ा गया। अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में इन सबकी कीमत करोड़ों में है। ये सारे आंकड़े फिल्म के विषय की गंभीरता की पुष्टि करते हैं। लेकिन, पहलाज निहलानी के नेतृत्व वाली सेंसर बोर्ड समिति इससे सहमत नहीं दिखी और उसने फिल्म में से 89 सीन काटने को कहा। सेंसर बोर्ड के इस फैसले से अनुराग कश्यप बुरी तरह आहत हुए और उन्होंने इसे कलात्मकता की हत्या बताया। अनुराग ने सेंसर बोर्ड के इस फैसले की तुलना उत्तर कोरिया के तानाशाही शासक किम जोंग उन से की और मामले को बॉम्बे हाईकोर्ट में उठाया। बोर्ड के सदस्य अशोक पंडित ने भी निहलानी के इस फैसले की आलोचना की।

विवाद को बढ़ता देख मौके का फायदा उठाने के लिए राजनीतिक पार्टियां भी बिन बुलाये मेहमान की तरह आ टपकीं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल फिल्म का समर्थन करते दिखे। तो शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी ने फिल्म के द्वारा पंजाब के गलत चित्रण का आरोप लगाया। मामले में राजनीतिक पार्टियों का इस करह कूद जाना बेवजह बिल्कुल भी नहीं है। अचानक इस मुद्दे को हवा देने की वजह पंजाब में होनेवाला अगला विधानसभा चुनाव है। फिल्म में चुनाव जीतने के लिए एक स्थानीय नेता को चुनाव-पत्र के साथ ड्रग्स बांटते दिखाया गया है। ड्रग्स को किस तरह कई प्रोडक्ट्स के साथ मिलाकर बनाया जाता है और उससे संबंधित फैक्ट्री के बारे में भी फिल्म में बताया गया है। साल 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा बड़े वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से सारी राजनीतिक पार्टियां फिल्म के पक्ष-विपक्ष में खेमेबाजी करने में जुट गई है।

बहरहाल, इस सारे विवाद में नुकसान पंजाब की धरती का हो रहा है। ऊर्जावान पंजाबी समुदाय में जिस तरह नशे का कारोबार पैर पसार रहा है वो बेहद चिंता का विषय है। समय रहते अगर इस गंभीर मुद्दे पर उचित कार्रवाई नहीं की गई तो आतंकवाद के दलदल से निकला पंजाब एक बार फिर नशे के कारोबार में धंस जायेगा और पूरे देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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