महत्वाकांक्षा के कुंड में रिश्तों की आहुति

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Rising Ambitions Dying Relations
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मुजफ्फरपुर इलाके के मोतीपुर में एक मुखिया प्रत्याशी की पत्नी की छत से गिरकर मौत हो गई और ये जानने के बावजूद मुखिया प्रत्याशी 6 घंटों तक अपने रिजल्ट का इंतजार करता रहा। जब वो वापस लौटा तो उसके चेहरे पर जीत की खुशी थी। अपनी इस खुशी के साथ उसने अपनी जीवन संगिनी को मुखाग्नि दी। अखबार के एक कोने में छपी इस खबर को पढ़ा तो कईयों ने होगा। लेकिन, इस छोटी सी खबर के पीछे छिपे मनोविज्ञान को किसी ने भी जानने की कोशिश नहीं की होगी।

ये मनोविज्ञान बहुत ही सीधा है। दरअसल, आदमी साधारण होने से बड़ा डरता है। ये भाव कि मैं साधारण हूं छाती पर पत्थर जैसा रख देता है। ये ख्याल कि मैं असाधारण हूं, विशिष्ट हूं, कुछ अनूठा हूं, लोगों को उड़ने के लिए पंख दे देते हैं। यही वजह है कि लोग अपने को ‘असाधारण’ बनाने की महत्वाकांक्षा में दिन-रात जुटे रहते हैं। महत्वाकांक्षा लोगों में पहले दूसरों से कमतर होने का भय भरता है। ये भय फिर कई भ्रमों को जन्म देता है। ये भ्रम कई-कई रुप धरकर लोगों को डराता है और फिर बाज़ार उन्हें इन सबसे उबरने के लिए महत्वाकांक्षा का रास्ता पकड़ा देता है। ये महत्वाकांक्षा लोगों को वैसी जगह खड़ा कर देती है जहां से इंसान खुद से और दुनिया से दूर होता चला जाता है।

इस ‘असाधारण’ बनने के खेल में फिर चाहे किसी की जान जाये या फिर किसी की जान लेनी पड़े, इसकी किसी को परवाह नहीं होती। बनियाकरण के इस दौर में पूछ उसी की है जो बाज़ार को चलाने की योग्यता रखता हो। जो बाज़ार को नहीं लुभा पाता, समाज भी उसे दरकिनार कर देता है। ऐसे में समाज में अपनी पूछ और पैठ बनाने के लिए लोग सारी संवेदनशीलता भुलाकर वो कर गुजरते हैं जो किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता।

इस खबर ने ये तो बता दिया कि अब गांवों और कस्बों में भी लोग बाज़ारवाद से प्रभावित हो रहे हैं। सफल होने के लिए रिश्तों की तिलाजंलि दी जा रही है। सोच बदल रही है, रिश्ते टूट रहे हैं और समाज तेजी से विघटन की ओर बढ़ रहा है। स्थिति बिगड़ रही है और हम सब आंखें मूंदें इस धारा में बहे चले जा रहे हैं। किसी के पास रुक कर सोचने का वक्त नहीं है। ऐसे में रिश्तों में आया ये ह्रास किस कदर सामाजिक संरचना को प्रभावित करेगा, इसकी कल्पना भी रूह को कंपा देती है।

‘बोल बिहार’ के लिए प्रीति सिंह

 

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