आओ एक पौधा लगायें

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World Environment Day
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कल यानि 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस है। फिर एक बार इस दिवस पर सरकारी, गैर सरकारी आयोजन किए जायेंगे। धूमधाम से पर्यावरण दिवस मनाया जायेगा। समारोह के आयोजन के लिए करोड़ों रुपये के फंड आयेंगे। खूब भाषणबाजी होगी। पौधे लगाते हुए कुछ लोगों की तस्वीरें अखबारों में आयेंगी और सारा कोरम पूरा हो जायेगा। इतना करने के बाद हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेंगे। लेकिन क्या वाकई में पर्यावरण के प्रति हमारा इतना ही ‘भर’ दायित्व है?

पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘परि’ तथा ‘आवरण।’ परि का अर्थ होता है चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है ढंका हुआ। इसका अर्थ होता है किसी भी वस्तु या प्राणी को जो चीज चारों ओर से ढंके हुए है वही पर्यावरण कहलाता है। हमारे वेदों में पर्यावरण की सुरक्षा और शुद्धता पर विशेष बल दिया गया है। वेदों में कहा गया है- ‘ऊं पूर्णभद: पूर्णामिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।‘ अर्थात् हम प्रकृति से उतना ही ग्रहण करें जितना हमारे लिए आवश्यक हो, इससे प्रकृति की पूर्णता को कोई क्षति न पहुंचें। पुराने जमाने में इसी भाव से लोग प्रकृति की वस्तुओं को ग्रहण करते थे। लेकिन आज हमने क्या किया है? जितनी जरूरत है हम उससे ज्यादा चीजों को हासिल करने में लगे हुए हैं। भले ही इसके लिए प्रकृति को कितना भी नुकसान पहुंचे।

हमारे स्वार्थ ने धरती पर से जंगलों का सफाया कर दिया है। हर जगह बिल्डिंग्स ही बिल्डिंग्स नजर आती हैं। कहीं मल्टीप्लेक्स हैं, कहीं मॉल है, कहीं ऊंचे-ऊंचे होटल हैं तो कहीं स्टेडियम हैं। लेकिन पेड़ कहीं नहीं हैं। ये प्रकृति के साथ क्या ज्यादती नहीं है? भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में प्रकृति को सृष्टि का उपादान कारण बताया है। माना जाता है कि प्रकृति के कण-कण में परमेश्वर का वास होता है। लेकिन हम हैं कि हर दिन प्रकृति के साथ-साथ परमेश्वर का भी शोषण करते हैं।

अमूमन प्रत्येक व्यक्ति पर 16 पेड़ होने चाहिएं। लेकिन भारत में 36 लोग एक पेड़ पर आश्रित हैं। पटना में स्थिति तो और भी बुरी है। तेजी से पसर रहे इस शहर में विकास के नाम पर हरे-भरे विशाल वृक्ष काटे जा रहे हैं और उसकी जगह सजावटी पेड़ लगाये जा रहे हैं। उनमें भी आधे से अधिक रख-रखाव के अभाव में सूख चुके हैं। शहर में मात्र एक वर्ग किलोमीटर में ढाई हजार से अधिक लोग रहते हैं। ये देश का सबसे घनी आबादी वाला शहर है। लेकिन जनसंख्या के हिसाब से पेड़ों की संख्या नगण्य है। गर्मी के मौसम में पैदल चलते वक्त चिलचिलाती धूप से राहत पाने के लिए पटना के बेली रोड छोड़कर किसी सड़क पर पेड़ की छाया खोजे नहीं मिलती। शहर के कॉलोनियों की भी यही हालत है। पेड़ वहां भी ढूंढ़े नहीं मिलता।

दानापुर, खगौल, बिहटा, आशियाना और दीघा जैसे ग्रामीण इलाकों में शहरी विस्तार के कारण तेजी से पेड़ गायब हो रहे हैं। शहर की सेहत खराब हो रही है।  हवा में जहरीले कणों की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है। विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में पटना को छठा स्थान दिया गया है। बावजूद इसके ना तो शहरवासी और ना ही सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर नजर आती है।

स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक लोग पर्यावरण को अपना मित्र नहीं मानेंगे। उनके साथ ही सरकारी स्तर पर भी गंभीर पहल करनी होगी। तो आईये इस पर्यावरण दिवस पर हम सब एक-एक पेड़ लगाने का दृढ़ संकल्प लें। हमारा ये छोटा सा प्रयास पर्यावरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।

‘बोल बिहार’ के लिए प्रीति सिंह

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