और तब तक पॉलिटिकल साइंस में खाना बनाने की पढ़ाई होती रहेगी

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Bihar InterToppers Saurabh & Ruby
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बिहार के शिक्षामंत्री डॉ. अशोक चौधरी के निष्पक्ष और कदाचारमुक्त परीक्षा के दावों की पोल उस वक्त खुल गई जब एक स्टिंग ऑपरेशन का विडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया। इस विडियो के अनुसार बिहार के इंटर बोर्ड की परीक्षा में आर्ट्स की टॉपर (रूबी राय) को यह पता है कि पॉलिटिकल साइंस में खाना बनाने की पढ़ाई होती है और साइंस टॉपर (सौरभ श्रेष्ठ) इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन में क्या अन्तर होता है..?

बिहार में प्रतिभा के धनी छात्रों की कमी हो ऐसा हरगिज नहीं। लेकिन आज इन ‘खोखले’ टॉपर्स को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं वो हमें शर्मसार करते हैं। शर्म के साथ-साथ हैरत की बात ये कि आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स – इन तीनों संकायों के टॉपर एक ही कॉलेज के हैं। यह कॉलेज है वैशाली जिले के पास भगवानपुर का विशुनराय कॉलेज। इस कॉलेज का विवादों से पुराना नाता रहा है। पिछले साल भी यह कॉलेज रिजल्ट में गड़बड़ियों के कारण चर्चा में रहा था और शिक्षा मंत्री ने इस कॉलेज का रिजल्ट रोक दिया था। अब जब कि इस साल इस कॉलेज ने अनियमितता की सारी सीमा पार कर दी है, यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा विभाग ने इस पर ठोस कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाई थी। आज नतीजा सामने है।

सच तो यह है कि जिस ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ पर हम अपनी भड़ास निकाल रहे हैं वे स्वयं हमारी ‘अव्यवस्था’ और हमारे नीति-निर्देशकों की ‘अदूरदर्शिता’ के शिकार हैं। ढूँढ़ने चलें तो इन जैसे कितने छात्र और विशुनराय कॉलेज जैसे कितने कॉलेज मिलेंगे, आप सोच भी नहीं सकते। चलिए हम कुछ आँकड़ों की मदद से इसे समझने की कोशिश करें। सुनकर आप चौंक जाएंगे कि बिहार में एक लाख की आबादी पर मात्र सात कॉलेज हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 27 कॉलेज का है। यही नहीं, बिहार में प्रति कॉलेज 2098 विद्यार्थियों का नामांकन होता है, जबकि राष्ट्रीय औसत 764 है। ऐसे में आप कैसी शिक्षा और कैसे परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं..?

खैर, ये तो बात हुई पढ़ने वालों की। अब जरा पढ़ाने वालों की बात करें। यहाँ तो स्थिति और भी भयावह है। क्या आप यकीन करेंगे कि बिहार में कई ऐसे कॉलेज हैं जिनमें कई-कई विषयों में एक भी प्राध्यापक नहीं हैं लेकिन ना केवल ‘जादुई’ तरीके से परीक्षा फॉर्म भरने के लिए जरूरी छात्रों की 75 प्रतिशत उपस्थिति पूरी हो जाती है बल्कि वे छात्र ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ की तरह जादुई अंक भी पा लेते हैं।

सबसे मजे की बात तो यह कि ये सब कुछ सरकार की नाक के नीचे हो रहा होता है और सरकार कभी गांव-गांव में शराब के ठेके खुलवाने में व्यस्त होती है तो कभी बंद कराने में। माना कि शराब जहर है और उसे बन्द करना चाहिए लेकिन इन छात्रों के जीवन में जो ‘विष’ घुल रहा है उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा..? हमारे ‘इंजीनियर’ मुख्यमंत्री, ‘नौंवी पास’ उपमुख्यमंत्री या नाम के पहले ‘डॉ.’ लगाने वाले हमारे शिक्षा मंत्री..?

महज खानापूरी करने वाले उपायों से अब कुछ नहीं होने वाला। जब तक राज्य में शिक्षा का आधारभूत ढाँचा नहीं होगा, आज की जरूरत और छात्रों की संख्या के मुताबिक शिक्षण-संस्थान नहीं होंगे और सबसे अहम कि उनमें ईमानदारी से पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं होंगे तब तक ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ हमारे बीच मौजूद रहेंगे, पॉलिटिकल साइंस में खाने बनाने की पढ़ाई होती रहेगी और उड़ता रहेगा मजाक हमारी शिक्षा-व्यवस्था का।

अन्त में एक बात और। सूचना क्रांति के दौर में ऐसी किसी घटना पर तत्काल अपनी राय देना और भड़ास निकाल लेना हमारी आदत बन चुकी है। होता ये है कि इधर भड़ास निकली नहीं कि उधर हम पूरे वाकये को भूल जाते हैं क्योंकि तब तक भड़ास निकालने को और कई ख़बरें हमारे सामने आ चुकी होती हैं। हमें सचेत रहना होगा कि कहीं ऐसा ही ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ वाली ख़बर के साथ भी ना हो।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

 

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