प्रकृति से खिलवाड़ पड़ रहा महंगा

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Extreme Heat Wave in India
Extreme Heat Wave in India

आसमान से आग बरस रही है। गर्मी का प्रचंड रूप अपना असर दिखा रहा है। लोग परेशान हैं। 33 शहरों में पारा 46 डिग्री से ऊपर जा चुका है। राजस्थान के फलौदी में तो पारा 51 डिग्री तक पहुंच गया है। जबकि यहीं के चूरू इलाके में पहली बार पारा 50 डिग्री से ऊपर जा पहुंचा। वहीं अहमदाबाद में गर्मी ने 100 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। गर्मी के कहर को देखते हुए मौसम विभाग ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में आरेंज अलर्ट घोषित कर दिया गया है। इन शहरों में लोगों को सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक बाहर निकलने से मना किया गया है।

लू लगने से देश भर से लोगों की मौत की खबरें आ रही हैं। भीषण गर्मी की वजह से गुजरात में 5, उड़ीसा में 19 और तेलगांना में 309 लोगों की जान जा चुकी है। लोग परेशान हैं और अपनी-अपनी सामर्थ्य के मुताबिक गर्मी से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं।

एक तरफ जहाँ गर्मी के कारण त्राहिमाम की स्थिति है वहीं दक्षिण भारत में भारी बारिश की वजह से बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। चेन्नई में बारिश की वजह से तीन लोगों की मौत हो गई है। यानि धरती का वातावरण पूरी तरह असंतुलित हो चुका है। कहीं अत्यधिक गर्मी और सूखे से लोगों की जान जा रही है तो कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश लोगों को डुबा रही है। अब सवाल ये है कि इस स्थिति का जिम्मेदार है कौन? नि:संदेह हम मानव। हमने प्रकृति को अपनी संपत्ति समझकर उसका बेजा उपयोग किया। पूरी दुनिया में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कर मनुष्य जाति ने जंगलों को तबाह कर दिया, नदियों को कूड़ाघर में तब्दील कर दिया और पहाड़ों को तोड़कर उनका दुरुपयोग की हद तक उपयोग किया। हमारी वजह से पशु-पक्षियों से उनके घर छिन गए। वो बेघर हो गए और हमारे कंक्रीट के मकान सजते चले गए।

विकास के नाम पर हमने जहाँ-तहाँ बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स खड़ी कर दीं। इसके लिए हमने जंगलों, नदियों और पहाड़ों को बर्बाद कर दिया। प्रकृति ये सारे अत्याचार चुपचाप सहती रही। मूक बनकर उसने सारी तकलीफों को झेल लिया। लेकिन हम उसकी दर्द की भाषा समझ कर भी अंजान बने रहे। आखिर प्रकृति का धैर्य जवाब दे गया और उसने हमें अपना जवाब उत्तराखंड हादसे के रुप में दिया। लेकिन, हम फिर भी नहीं सुधरे।

बढ़ती गर्मी, अत्यधिक या अल्प बारिश, शीतलहर का प्रकोप, बार-बार भूकंप का आना सब प्रकृति के साथ हमारे छेड़छाड़ का नतीजा है। जरूरत से ज्यादा वाहनों के बोझ से दबे हिमालय के क्षेत्रों में पहाड़ों के पैर डगमगा रहे हैं। उनके नीचे धीरे-धीरे दबाव बन रहा है जो आने वाले वक्त में बड़े भूकंप की वजह बन सकता है। पनबिजली परियोजनाओं के तहत बनाये जा रहे बांध ऊर्जा के विभिन्न रूपों को किसी छोटे से इलाके में केन्द्रित कर रहे हैं। बांधों के लिए बने जलाशयों में जमा तलछट जब बाहर आयेगा तो आसपास के पूरे इलाके का मटियामेट होना तय होगा।

कुल मिलाकर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और हम अपनी भौतिक उन्नति में उलझे हुए हैं। अगर हमने अब भी प्रकृति की अनदेखी करना बंद नहीं किया तो आनेवाला समय किस कदर तबाही के मंजर दिखायेगा इसकी कल्पना भी शायद हमें महंगी पड़ जायेगी।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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