‘कांग्रेस-मुक्त’ भारत के संदेश का मतलब ‘भाजपा-युक्त’ भारत नहीं

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Rahul Gandhi & Narendra Modi
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पाँच राज्यों के चुनाव-परिणाम कठिन समय से गुजर रही कांग्रेस के लिए अधिक कठिन समय और अच्छे दिनों में चल रही भाजपा के लिए अधिक अच्छे दिन लेकर आए। खास तौर पर असम की जीत भाजपा की बड़ी उपलब्धि रही। बंगाल और केरल में भी उसने उपस्थिति दर्ज की और उसके वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ। भारत के मानचित्र पर देखें तो इस वक्त 69 प्रतिशत हिस्से में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकार है जबकि कांग्रेस की सत्ता केवल 14 प्रतिशत हिस्से में है। ऐसे में इन परिणामों को ‘कांग्रेस-मुक्त’ भारत का संदेश भले कह लें लेकिन क्या इसका मतलब ‘भाजपा-युक्त’ भारत भी है..? क्या ऐसा कहना थोड़ी जल्दबाजी ना होगी..?

इन चुनावों में असम के रूप में भाजपा के लिए उत्तर-पूर्व का ‘मुख्य द्वार’ भले खुल गया हो लेकिन क्या पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ की ऐतिहासिक जीत और तमिलनाडु में ‘अम्मा’ का 27 साल के मिथक को तोड़ लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करना हल्के में लेने की बात है..? केरल भी तो अंतत: ‘लाल’ हो ही गया और पुडुचेरी में भी सरकार डीएमके और कांग्रेस की बनने जा रही है..!

बहरहाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बता दिया कि वो अकेले सब पर भारी हैं। वहाँ ना तो लेफ्ट और कांग्रेस का ‘अस्वाभाविक’ गठबंधन उनके सामने टिका, ना ही मोदी और उनके रणनीतिकारों की ‘मेहनत’ काम आई। यहाँ ममता अकेले 294 में से 211 सीटें ले उड़ीं और मुकाबले को एकतरफा कर दिया। कांग्रेस को 44, लेफ्ट को 32, भाजपा को 3 और अन्य को 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

उधर तमिलनाडु में जयललिता ने जबरदस्त वापसी की। 27 सालों में यहाँ पहली बार ऐसा हुआ कि एक पार्टी की सरकार लगातार दूसरी बार बनने जा रही है। यहाँ की 234 में से 134 सीटें एआईएडीएमके के खाते में गईं। डीएमके और कांग्रेस मिलकर भी एआईएडीएमके का सामना नहीं कर पाईं। तमाम कोशिशों के बावजूद करुणानिधि की पार्टी को जहाँ 89 सीटें ही मिलीं, वहीं कांग्रेस किसी तरह 8 सीटों पर काबिज हो पाई। अन्य के खाते में 1 सीट गई।

हाँ, सर्वानंद सोनोवाल को आगे कर असम में सत्ता की दौड़ भाजपा ने जीती और अब पूर्वोत्तर में पहली बार उसकी सरकार बनने जा रही है। यहाँ कांग्रेस को 15 साल के शासन से बेदखल करते हुए उसके गठबंधन ने 126 सीटों में से 86 सीटें अपने नाम कर लीं, जबकि कल तक यहाँ शासन में रही कांग्रेस अपने साथियों के साथ महज 26 सीटों पर सिमट गई। आईयूडीएफ को 13 और अन्य को 1 सीट मिली।

बुरे वक्त से गुजर रही कांग्रेस को केरल में भी निराश होना पड़ा। यहाँ की 140 सीटों में से 91 सीटें लेफ्ट गठबंधन के हिस्से में गईं और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 47 सीटें ही मिल पाईं। 1 सीट के साथ यहाँ भाजपा ने भी अपना खाता खोला और बची 1 सीट अन्य को मिली। हाँ, 30 सीटों वाले पुडुचेरी ने डीएमके और कांग्रेस के जख्म पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया। इन दोनों ने मिलकर यहाँ 17 सीटें अपने नाम कीं, जबकि एआईएनआरसी को 9, एआईएडीएमके को 4 और अन्य को 1 सीट मिली।

इन राज्यों के परिणाम आने के बाद स्वाभाविक रूप से कांग्रेस खेमे में मायूसी है और भाजपा उत्साहित दिख रही है। भाजपा का ये उत्साह अकारण नहीं है। अगर इन पाँच राज्यों की सीटों को मिलाकर देखें तो भाजपा ने 670 सीटों पर चुनाव लड़ा और 65 सीटों पर दर्ज की, जबकि 2011 में पार्टी ने 771 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे बस 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस तरह उसकी सीटों में इस बार जहाँ 13 गुना इजाफा हुआ वहीं असम भी उसकी झोली में आ गिरा। लेकिन इन परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय दलों का युग अभी समाप्त होने वाला नहीं। पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ और ‘तमिलनाडु’ में अम्मा का बज रहा डंका इसका सबूत है। भाजपा को दिल्ली (आप) और बिहार (महागठबंधन) से मिला जख़्म भी अभी सूखा नहीं है। उधर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उसके सामने मुलायम और मायावती  चुनौती बनकर खड़े हैं तो उड़ीसा में नवीन पटनायक (बीजद) को हिलाना आसान नहीं। एक उदाहरण जम्मू-कश्मीर का भी है जहाँ के शासन में भाजपा महबूबा (पीडीपी) के साथ पिछली सीट पर बैठने को विवश है। कुल मिलाकर ये कि दिन-ब-दिन कमजोर होती कांग्रेस से देश भर में भाजपा को जितना भी लाभ मिला हो, सच यही है कि उससे कहीँ अधिक ‘फायदे’ में क्षेत्रीय दल रहे हैं।

बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

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