स्काई ट्रेन तो ठीक है पर ज़मीन पर रेंगने वाली सवारियों का क्या..?

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SkyTrain Coming in Bihar
SkyTrain Coming in Bihar

नीतीश सरकार जानती है कि उस पर अपेक्षाओं का कैसा और कितना भार है। ऊपर से नीतीश ‘अखिल भारतीय’ सपने संजो रहे हैं वो अलग। ऐसे में उनकी सरकार लगातार कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रही है कि उसका असर ना केवल बिहार बल्कि देश भर में हो। शराबबंदी अभियान इसका बड़ा उदाहरण है और नीतीश इसको लेकर सुर्खियों में हैं भी। कुछ ऐसी ही कोशिशों के तहत उनकी सरकार की निगाहें अब स्काई ट्रेन पर जा टिकी हैं। जी हाँ, मोदी जी की दिल्ली अभी मेट्रो से आगे नहीं बढ़ी है लेकिन बिहार में स्काई ट्रेन दौड़ाने की कोशिश की जा रही है..!

याद दिला दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चयों में एक निश्चय पाँच घंटे में बिहार के किसी भी कोने से पटना पहुँचना है। पर बिहार के नगर विकास एवं आवास विभाग की कोशिश इस समय को और कम करने की है। इतना कम कि शायद आप यकीन ना करें। जी हाँ, अगर विभाग की ये कोशिश रंग लाई तो बहुत जल्द बिहार में स्काई ट्रेन दौड़ती दिखाई देगी जो बिहार के जिला मुख्यालयों से पटना को 240 से 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जोड़ेगी।

नगर विकास एवं आवास विभाग ने इस दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए हैं। सरकार इस योजना को पीपीपी मोड (सार्वजनिक-निजी सहभागिता) पर चलाएगी। विभाग के मंत्री माहेश्वर हजारी ने स्काई ट्रेन का निर्माण करने वाली कम्पनी ‘नाईटशेड ग्लोबल इंफ्रा’ से विचार-विमर्श के बाद अधिकारियों से इस दिशा में आगे बढ़ने को कहा है। जल्द ही विभाग इस प्रोजेक्ट की तकनीकी जाँच कराएगा। रिपोर्ट में सब कुछ ठीक रहा तो सरकार इस योजना को अमलीजामा पहनाने में लग जाएगी।

बता दें कि स्काई ट्रेन को नासा ने डिजाईन किया है। पोल के सहारे चलने वाली यह ट्रेन छोटी-छोटी बोगियों का समूह होगी। एक बोगी में चार लोग बैठ सकेंगे। मेट्रो ट्रेन से तुलना करें तो स्काई ट्रेन रफ्तार में उससे लगभग चार गुना तेज और लागत में लगभग चार गुना कम होगी। मेट्रो की रफ्तार 55 से 80 किमी प्रति घंटा होती है, जबकि स्काई ट्रेन की 240 से 260 किमी प्रति घंटा। इसी तरह मेट्रो की लागत 250 से 500 करोड़ प्रति किमी होती है, जबकि स्काई ट्रेन की 90 से 120 करोड़ प्रति किमी।

स्काई ट्रेन की एक बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए भूमि अधिग्रहण की ज्यादा जरूरत नहीं होगी। यही नहीं, इसके रखरखाव पर भी ज्यादा खर्च नहीं होगा और ध्वनि प्रदूषण भी काफी कम होगा। बता दें कि वर्तमान में इस ट्रेन का परिचालन इजरायल में हो रहा है। जहाँ तक भारत की बात है तो बिहार स्काई ट्रेन चलाने वाला पहला राज्य होगा। बिहार सरकार इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत बुद्ध सर्किट से करना चाहती है और पहले चरण में इस योजना के तहत गया, बोधगया, राजगीर, वैशाली, केसरिया, अरेराज और लोरिया जैसे शहर पटना से जुड़ेंगे।

बहरहाल, स्काई ट्रेन को ‘जमीन’ पर उतरने में वक्त लगेगा। जैसा कि इस तरह की परियोजनाओं में हुआ करता है, कई आर्थिक और व्यावहारिक पेचीदगियां भी आएंगी रास्ते में। फिर भी मान लेते हैं कि बिहार सरकार इस मुश्किल से दिखने वाले काम को अंजाम देने में सफल हो जाएगी। लेकिन क्या ठीक इसी जगह कुछ सवाल भी नहीं उठते मन में..? क्या स्काई ट्रेन की कल्पना करने से पहले जिला मुख्यालयों से लेकर राजधानी पटना तक में चलने वाली ख़स्ताहाल बसें आँखों के आगे घूम नहीं घूम जातीं..? ऐसी बसें जिन्हें कायदे से कबाड़ में भी नहीं बिकना चाहिए उसमें लोगों का भेड़-बकरी-सा लदा होना आम है यहाँ। ठीक ऐसा ही हाल भाड़े की जीप और ऑटो का है। इनके लिए तो जैसे कोई नियम-कानून बना ही नहीं। बना भी हो तो दस-बीस के नोट ट्रैफिक पर खड़े ‘वर्दीधारी’ को पकड़ाएं और अभद्रतम भोजपुरी गाने बजाते हुए तीन की छह और छह की जगह बारह पैसेंजर लेकर उनके सामने से निकल जाएं। बचे रिक्शा और टमटम। इन्हें तो जैसे विकास के हर मानचित्र से ठेलकर बाहर कर दिया गया हो। यातायात के ये साधन विलुप्त होने की कगार पर हैं, पर हैं तो सही। और जब हैं तो क्या इनके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं..?

ये अच्छी बात है कि संसार के ‘पहले गणतंत्र’ की स्थापना से लेकर ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की उद्घोषणा तक देश और दुनिया की अगुआई करने वाला बिहार स्काई ट्रेन जैसी यातायात की नई तकनीक का इस्तेमाल कर मूलभूत सुविधा के क्षेत्र में भी देश की अगुआई करने की सोच रहा है लेकिन क्या इसके लिए हमें एकदम सिरे से सोचने की जरूरत नहीं..?

 ‘बोल बिहार के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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