ये कहाँ जा रहे हम ?

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Modern Lifestyle-Loneliness-Suicide
Modern Lifestyle-Loneliness-Suicide

सुबह की शुरुआत एक बुरी ख़बर के साथ हुई। ख़बर थी हमारी कॉलोनी की एक 20-22 साल की लड़की ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। ख़बर ने पूरी कॉलोनी के लोगों को स्तब्ध कर दिया। एक उच्च अधिकारी की बेटी को जिसे जीवन की सारी भौतिक सुख-सुविधायें आसानी से उपलब्ध थीं, उसके द्वारा इस आत्मघाती कदम को उठाये जाने की घटना ने कई पहलुओं पर सोचने पर मजबूर कर दिया।

हम आज एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हताशा और तनाव सबसे ज्यादा लोगों के मन पर हावी है। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लोग भागे जा रहे हैं। किसी के पास ना अपनों के लिए वक्त है और ना गैरों के लिए, यहाँ तक कि उनके पास खुद के लिए भी वक्त नहीं है। एक अंधी दौड़ मची हुई है और सब कोई बिना जाने-बूझे बस भागे जा रहे हैं। ये भागदौड़ सिर्फ ज्यादा-से-ज्यादा सुख-सुविधाओं को जुटाने के लिए है। समाज में जिसका ओहदा बड़ा उसे ही सबसे खुशहाल समझा जाता है। लेकिन क्या वास्तविकता यही है? हाल के कुछ दिनों की घटनाओं पर गौर करें तो ऊँचे और संभ्रात घरों के लोगों में आत्महत्या की घटना सबसे ज्यादा घटी है। ऐसा आखिर क्यों हुआ? जिन लोगों के पास ईश्वर का दिया सब कुछ है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? जवाब बिल्कुल साफ है। उनके पास सब ‘कुछ’ तो है। लेकिन अपनों का ‘वक्त’ नहीं है।

आज हम घोर वैचारिकता के अभाव के दौर से गुजर रहे हैं। यहां ‘सब कुछ’ तो है। लेकिन अपना कुछ भी नहीं है। विचार, सोच, राय सब फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सअप की दी हुई है। लोग तकनीकों के द्वारा एक-दूसरे से संपर्क स्थापित तो कर रहे हैं। लेकिन इस चक्कर में पास बैठे अपने की तकलीफ नहीं महसूस कर रहे। आपसी बातचीत की कमी रिश्तों में गांठ पैदा कर रही है। माँ-बाप बच्चों को नहीं समझ रहे और बच्चे माँ-बाप को नहीं समझ पा रहे। हालात इस कदर खराब हो रहे हैं कि दो अजनबियों का एक-दूसरे से बात करना देखने वालों के लिए किसी विस्मयकारी घटना से कम नहीं है। मन में एक-दूसरे के प्रति आदर, विश्वास और सहानुभूति की जगह अविश्वास और शक ने ले ली है। इंसान इंसान को संदेह भरी दृष्टि से देखता है। भौतिक स्वार्थों की वजह से लोग खुद में सिमटते चले जा रहे हैं। अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की परेशानियों में भी हम अपना फायदा और नुकसान तलाशते हैं। किसी का दुख अब हमें दुखी नहीं करता। हाँ, किसी का सुख हमें जरूर दुखी कर जाता है।

याद कीजिए हम सबने कब अपनों के साथ मिलकर एक दिन गुजारा है? आज घर में रहते हुए भी एक-दूसरे से ज्यादा हम तकनीकों के साथ होते हैं। पहले टीवी ने घर के अंदर जगह ली और आज मोबाइल अपनों के बीच आ चुका है। ऑटो, ट्रेन, बस, प्रतीक्षालय सब जगह लोग किसी से बात करने की अपेक्षा मोबाइल में घुसे नजर आते हैं। ऐसे में एक-दूसरे का सुख-दुख जानने की ना तो किसी की इच्छा है और ना वक्त। हर कोई अपने ही भीतर चल रहे कोलाहल से लड़ रहा है। लोग तनाव में आ रहे हैं और यही तनाव उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

अब वक्त है चेत जाने का। अगर तकनीक इस कदर हमारी दिनचर्या पर हावी होती चली जाएगी तो वो दिन दूर नहीं जब इंसान अपनी हताशा और तनाव के आगे घुटने टेककर एक ऐसे संसार का निर्माण कर बैठे जहां लोग संघर्ष की बजाय पलायन को ही अपना धर्म समझने लगें।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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