भरोसे की अनदेखी पड़ सकती है महंगी

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Nitish Kumar
Nitish Kumar

राज्य में जिस तरह लगातार हत्याओं का दौर जारी है उसने एक बार फिर जंगलराज की वापसी का संकेत दे दिया है। नीतीश और लालू की जुगलबंदी पर जिस तरह से उस वक्त देश भर में बिहारी मतदाताओं की योग्यता पर संदेह जताया गया था, वो आज के हालात को देखते हुए कमोबेश सही प्रतीत होता दिख रहा है।

पिछले कुछ महीनों में राज्य में अपराधी एक बार फिर से मुखर हुए हैं। जिस नीतीश सरकार की वापसी लोगों ने बेहतर शासन व्यवस्था के लिए की थी, उसी सुशासनी सरकार में आये दिन हत्यायें हो रही हैं और मुख्यमंत्री सिर्फ आश्वासन देने में लगे हुए हैं। पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर गौर करें तो 26 दिसम्बर 2015 को दरभंगा में निर्माण कंपनी के दो इंजीनियरों की हत्या, 16 जनवरी 2016 को पटना में ज्वेलर रविकांत की हत्या, 5 फरवरी 2016 को दिनदहाड़े लोजपा नेता बृजनाथी सिंह की हत्या, 12 फरवरी 2016 को भोजपुर में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विशेश्वर ओझा की हत्या, 8 अप्रैल 2016 को पटना में दवा व्यवसायी अनिल अग्रवाल की हत्या, 18 अप्रैल 2016 को पंडारक में दारोगा सुरेश ठाकुर की हत्या, 7 मई 2016 को गया में छात्र आदित्य की हत्या और 13 मई 2016 को सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या। ये सिर्फ बड़ी वारदातों के आंकड़े हैं जिनकी चर्चा मीडिया में रही। छोटी-मोटी आपराधिक घटनायें इसमें शामिल नहीं हैं। उनकी फेहरिस्त अलग है।

आपको याद होगा, जब नीतीश सरकार ने साल 2005 में लालू प्रसाद के खिलाफ जाकर सत्ता हासिल की थी, उस वक्त राज्य के हालात बेहद खराब थे। कानून-व्यवस्था पर से आम लोगों का विश्वास उठ चुका था। लोग शाम ढलते ही घरों में रहना मुनासिब समझते थे। बड़ी संख्या में व्यापारी वर्ग राज्य से पलायन कर चुके थे। पूरे देश में राज्य के लोगों को हिकारत भरी नजरों से देखा जा रहा था। बिहार में खौफ के साम्राज्य को फिल्मों में अतिरंजना के साथ पेश किया जा रहा था। ऐसे अविश्वास भरे माहौल में नीतीश सरकार ने न सिर्फ राज्य को संभाला, बल्कि उसकी विधि-व्यवस्था को भी दुरुस्त किया। अपनी नीति कुशलता से नीतीश कुमार ने सूबे के हालात काफी बेहतर किए और राज्य के साथ-साथ अपनी छवि को भी चमकाया। लेकिन, अपनी तानाशाही प्रवृत्ति और अफसरों को खुली छूट देने के उनके आदेश ने उनकी पार्टी के कई लोगों को ही उनका विरोधी बना दिया। अति आत्मविश्वास में बीजेपी से अलग होने और फिर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने की दो भूल ने नीतीश कुमार को एक वक्त राजनीति के हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया। एक समय ऐसा भी आया जब लगा नीतीश कुमार अब दुबारा सत्ता का मुंह नहीं देख पायेंगे। लेकिन तभी सभी अंदेशों को धता बताते हुए नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया। उनके इस फैसले की एक बार फिर चारों ओर से आलोचना हुई। लोगों ने इसे नीतीश कुमार के जीवन की सबसे बड़ी ‘गलती’ करार दिया। पर विधानसभा चुनाव हुए और आश्चर्यजनक रुप से राज्य में सबसे बड़ी पार्टी राजद बनकर उभरी।

जिस उद्देश्य को लेकर नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद के साथ सालों पुराने विवाद को भूलाकर हाथ मिलाया था, वो हासिल हुआ। लालू जी ने अपनी विवशताओं की वजह से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री तो बनने दिया। लेकिन उनके कंधों पर राजनीति में ‘नौसिखिये’ अपने दो बेटों को चढ़ा दिया। इस सरकार की देश भर में किरकिरी हुई। लोगों ने खुलकर सोशल मीडिया पर बिहारी वोटरों को लताड़ा और आनेवाले वक्त में उस ‘जंगलराज’ के फिर से आने की चेतावनी दी, जिस तमगे को कभी नीतीश सरकार ने पूर्ववर्ती राजद सरकार को प्रदान किया था।

उस वक्त देश भर के लोगों की ये प्रतिक्रियायें बिहारियों को बुरी लगी थी। उन्हें उम्मीद थी कि कई सालों के राजनीतिक वनवास की सजा काट कर लौटे राजद प्रमुख अपने बेटों को कई ऐसी गलती नहीं करने देंगे, जैसी गलतियां उनकी पिछले शासन के दौरान हुई थी। नीतीश कुमार जैसे योग्य राजनीतिज्ञ के हाथों में शासन की बागडोर ने भी वोटरों को कुछ भी गलत न होने का भरोसा दिलाया था। लेकिन, नीतीश सरकार के सत्ता संभालते ही जैसे एक बार फिर पुराने दिन वापस आने लगे। राज्य में चोरी, अपहरण, दुष्कर्म और हत्याओं की घटनाओं में इजाफा होने लगा। खुलेआम लोगों की हत्यायें की जाने लगीं।

यकीनन, ये हालात नीतीश सरकार की उस छवि को चुनौती है जो उन्होंने सालों की मेहनत से अर्जित की है। कहते हैं जब भरोसा एक बार टूटता है तो दुबारा फिर हासिल नहीं किया जाता। यदि नीतीश कुमार ने जल्द ही कड़े कदम उठाकर एक बार फिर राज्य की विधि-व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं किया तो वो उस भरोसे और उम्मीद को खो बैठेंगे जिसे राज्य भर के लाखों वोटरों ने उन पर जताया है और ऐसे में सत्ता के भी उनके हाथ से फिसलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

‘बोल बिहार’ के लिए प्रीति सिंह

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