पंचायतों में ‘महाभारत’ का दौर

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Our Panchayat in Present Time
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अखबार की एक छोटी सी खबर ने ध्यान को तेजी से अपनी ओर खींचा। एक मुखिया जी का तीनमंजिला आलीशान मकान भरभरा कर जमींदोज हो गया। मकान गिरने की इस खबर ने लोगों को अचंभित जरूर किया। लेकिन किसी ने उस पहलू पर गौर नहीं किया जिसने मुझे अपनी ओर आकर्षित किया। वो पहलू था मुखियाजी के मकान का ‘तीनमंजिला’ और ‘आलीशान’ होना। ऐसा नहीं है कि पहले के सारे मुखियाजी विपन्न होते थे पर अब मुखिया होने पर आपको सहज रूप से ‘साधन-सम्पन्न’ माना जाता है, ये एक बड़ा परिवर्तन है।

दरअसल, पंचायती राज नीति लागू होने के बाद जिस कदर आपाधापी के साथ चुनाव लड़े और जीते गए, उसने एक नई मानसिकता को जन्म दिया। ये मानसिकता थी जल्दी-से-जल्दी रुपये बनाओ। धन कमाने की होड़ ने एक नई परंपरा को जन्म देकर पूंजीवाद को मजबूती प्रदान की है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह पंचायत चुनाव भी शक्ति और धन का ‘खेल’ बनकर रह गए हैं। पंचायत में चुनावी होड़ ने गांवों के आपसी सद्भाव को खत्म कर दिया है। गांव के लोग जो सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे, अब एक-दूसरे के दुख के लिए कुचक्र रचने लगे हैं। जाति की दीवार गिरने के जितने दावे किए गए, उससे ज्यादा जातियां एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो गईं। लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे होने लगे। पंचायत चुनाव में धन-बल दिखाने का जो दौर शुरू हुआ वो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। वो सारी चालें जो कभी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल की जाती थीं, अब पंचायत चुनाव में आजमाई जाने लगीं।

इतना ही नहीं, पद का दुरुपयोग कर निजी संपत्ति बनाने का सिलसिला भी बढ़ता चला गया। बदलती रुत में पहले तो मुखिया जी का चोला बदला और फिर उसके बाद उनकी सवारी भी बदली। मोटा खद्दर पहनने वाले मुखियाजी की जगह आधुनिक मुखियाजी ने ले ली और उनकी साईकिल की सवारी को बोलेरो ने मात दे दी। सरकारी योजनाओं के पैसे जेबों में जाने लगे और गांव के गरीब जस-के-तस रह गए। पंचायतें राजनीतिक पैंतरे और तिकड़म सीखने का मंच बनकर रह गईं।

मौजूदा दौर में जब बिहार में पंचायत चुनाव चल रहे हैं, ऐसी बानगियां आये दिन देखने को मिल रही हैं। कहीं वोट के लिए गुंडागर्दी की जा रही है तो कहीं लोगों को धमकाया जा रहा है। कई जगह तो लोगों की हत्या भी कर दी गई है। विगत कुछ सालों में जिस तरह पंचायत चुनाव में हिंसा का बोलबाला बढ़ा है उसने 90 के दशक के विधानसभा चुनावों की याद दिला दी है। उस वक्त भी चुनावों में इसी तरह हिंसा का सहारा लिया जाता था। आज वक्त बदल गया है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों की सूरत भी बदल गई है। लेकिन किसी मंझे हुए सियार की तरह दबे पांव हिंसा पंचायत चुनावों में अपना रंग दिखाने लगी है।

सत्ता की लालसा में एक भाई दूसरे भाई के खून का प्यासा हो गया है। जिस पंचायत चुनाव के द्वारा गांव में खुशहाली और शांति लाने के सपने देखे जा रहे थे उसी पंचायत चुनाव ने गांव के हर घर को एक-दूसरे का प्रतिद्वंदी बना दिया है। हालात बिगड़ रहे हैं। गांववासियों की आपसी एकता और सद्भाव अब फिल्म मदर इंडिया की कहानी बनकर रह गए हैं। नीति, मूल्य, सिद्धांत सब ताक पर रखकर सत्ता का युद्ध लड़ा जा रहा है, जिसमें महाभारत की लड़ाई की तरह अपने ही अपनों के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

अगर सामाजिक स्तर पर इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया तो हिंसा और आपसी मनमुटाव का ये दौर किसी विषम संकट को न्योता दे सकता है और वैसी स्थिति में देश की सुरक्षा और सद्भाव को भी इससे गहरा आघात पहुंच सकता है।

बोल बिहार के लिए प्रीति सिंह

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