सृजन को नया आयाम देती स्वेतलाना एलेक्सिएविच

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Svetlana Alexievich
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आज जबकि पत्रकारिता ‘सेंशेसन’ में खोती जा रही है और मानव-मन के भीतर झाँकने का चलन खत्म-सा हो गया है, स्वेतलाना एलेक्सिएविच को पढ़ना बड़ा सुकून देता है। स्वेतलाना हमें बहुत शिद्दत से बताती हैं कि इतिहास केवल समय के बहाव और उस पर अंकित तारीखों में नहीं होता, इतिहास मानव-मन के भीतर हिलोड़ें लेती भावनाओं का भी हो सकता है। अगर भीतर के उस इतिहास को आकार लेते देखना हो तो स्वेतलाना को पढ़ना सचमुच जरूरी है।

प्रत्यक्षदर्शियों की जुबान से कहानी कहने में महारत रखने वाली स्वेतलाना को 2015 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार मिलना केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि वो महिला हैं और उनसे पहले केवल 13 महिलाओं को साहित्य का नोबेल मिला है। महत्व इस बात का है कि स्वेतलाना के रूप में पहली बार किसी पत्रकार को इस सम्मान के लिए चुना गया।  उन्हें यह सम्मान ‘भावनाओं के इतिहास’ को संकलित करने वाली उनकी खोजी किताबों के लिए दिया गया जिनमें पूर्व सोवियत संघ के लोगों के जीवन को ऐसी बारीकी से उकेरा है उन्होंने कि सृजन को भी उससे नया आयाम मिलता है।

स्वेतलाना का जन्म 31 मई, 1948 को यूक्रेन के शहर स्तानिस्लाव में हुआ। उन्होंने यूक्रेन, फ्रांस और बेलारूस में लम्बा समय बिताया। उनके पिता बेलारूस के थे और माँ यूक्रेन की। 1962 में स्वेतलाना अपने माता-पिता के साथ बेलारूस आ गईं और यहीं पर अपनी पढ़ाई पूरी की। इस नोबेल पुरस्कार विजेता ने एक स्थानीय अखबार में रिपोर्टिंग करने के लिए स्कूल की पढाई छोड़ दी थी। खैर, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकार व शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध, सोवियत-अफगान युद्ध, सोवियत संघ के पतन और चेरनोबिल आपदा जैसे विषयों पर लिखा और कुछ ऐसा लिखा कि उनकी कृतियां ‘वायसेस ऑफ यूटोपिया’ कहलाईं। अकारण नहीं कि 1985 में आई उनकी पहली किताब ‘वॉर्स अनवुमेनली फेस’ की अब तक 20 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। खोजी प्रकृति की स्वेतलाना ने इस किताब के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने वाली सैकड़ों महिलाओं का इंटरव्यू लिया था।

विषय-चयन और पूर्वतैयारी की बात करें तो स्वेतलाना एलेक्सिएविच सधी हुई पत्रकार हैं और जब वो ‘ट्रीटमेंट’ और विश्लेषण पर आती हैं तो करुणा से ओतप्रोत साहित्यकार दिखेंगी। यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र में 1986 में हुए हादसे पर लिखी गई उनकी बहुचर्चित किताब ‘वॉयसेस ऑफ चेरनोबिल’ इसका लाजवाब उदाहरण है। उनकी एक और किताब है ‘सेकैंड हैंड टाइम’ जिसमें वो बड़ी संवेदना के साथ पड़ताल करते दिखेंगी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियतकालीन पीढ़ियों ने खुद को नई दुनिया में कैसे ढाला। ‘जिंकी ब्वॉयज’, ‘द लास्ट विटनेसेज : द बुक ऑफ अनचाइल्डलाइक स्टोरीज’ तथा ‘एनचांटेड विथ डेथ’ उनकी अन्य कृतियां हैं।

स्वेतलाना की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। कई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं। उनकी स्वीकार्यता आज दुनिया भर में है लेकिन ये तथ्य हैरान करता है कि रूसी भाषा में लिखी उनकी कुछ किताबें ‘विवादों’ का शिकार होकर उनके अपने ही देश में प्रकाशित नहीं हो पाईं। कारण जो भी हो, अभिव्यक्ति पर इस तरह की ‘बंदिश’ बताती है कि आज भले ही चाँद के बाद मंगल पर भी दस्तक दे दी हो हमने, पर सच ये है कि धरती पर रहना भी हम ठीक से नहीं सीख पाए अब तक। स्वेतलाना एलेक्सिएविच, सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन जैसों का महत्व इस कारण भी है कि वे हमें इस बात की याद दिलाते रहते हैं।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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