ये डिग्री किस काम की..?

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A Degree of No Use
A Degree of No Use

प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ द्वारा इस साल दुनिया के सौ प्रभावशाली लोगों में शुमार किए गए रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भारतीय छात्रों को सलाह दी है कि वे ‘बेकार’ डिग्री के जाल में ना उलझें। बीते शनिवार को ग्रेटर नोएडा के शिव नादर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि छात्र ठगने वाले स्कूलों के झांसे में ना आएं। ये स्कूल उन्हें कर्ज में डुबो देंगे और डिग्री भी ऐसी देंगे जो किसी काम की नहीं होगी। ऐसा क्यों कहा राजन ने..? क्या है उनकी चिन्ता का कारण..? जाहिर है कि इतनी बड़ी बात उन्होंने यूँ ही नहीं कही होगी।

रघुराम राजन ने कितनी बड़ी बात उठाई है इसका अंदाजा हमें कुछ आँकड़ों से होगा। आँकड़े बताते हैं कि भारतीय प्रबंधन स्कूलों से निकलने वाले महज 7 प्रतिशत छात्र ही सलीके की नौकरी पाते हैं और ये छात्र आमतौर पर 20 शीर्ष रैंकिंग वाले संस्थान और आईआईएम के होते हैं। दूसरी ओर शेष 5500 प्रबंधन स्कूलों के अधिकतर छात्र बेरोजगार निकलते हैं। अगर उन्हें नौकरी मिलती भी है तो 10 हजार प्रति माह या इससे कम की, जबकि एमबीए की डिग्री लेने का औसत खर्च तीन से पाँच लाख तक है।

इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले छात्रों को देखें तो यहाँ भी स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। आँकड़ों के अनुसार भारत में हर साल 15 लाख छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री पाते हैं पर इनमें से 20-30% छात्रों को नौकरी नहीं मिलती और जिन्हें मिलती है उनमें से सिर्फ 7.49% छात्र ही ‘कोर’ इंजीनियरिंग की नौकरी पाते हैं।

स्थिति सचमुच भयावह है। पिछले दो सालों की ही बात करें तो ना केवल कैंपस प्लेसमेंट 45% घटा बल्कि वेतन में भी गिरावट आई। कुछ समय पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी डिग्री और रोजगार के इस ‘असंतुलन’ पर चिन्ता जाहिर की थी। उन्होंने आगाह किया था कि अगर हालात नहीं बदले तो एक दिन ऐसा आएगा जब लोगों के पास डिग्रियां तो ज्यादा होंगी मगर सटीक जरूरत के हिसाब से ‘मैनपावर’ कम। आखिर क्या है इसका समाधान..?

समाधान की बात करें तो हमें एक साथ तीन मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, प्रबंधन, इंजीनियरिंग या ऐसी तमाम डिग्रियाँ देने वाले संस्थानों की गुणवत्ता पर पूरी गंभीरता के साथ काम किया जाय ताकि डिग्रियाँ महज शोभा की वस्तु ना रहे। दूसरा, सभी योग्य छात्रों के लिए डिग्री लेना सस्ता करने का प्रयास हो। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण ये कि तमाम डिग्रियाँ हमारे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे और वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखकर ‘डियायन’ की जाएँ। इन सभी मोर्चों पर ईमानदार और अनवरत कोशिश करने पर ही डिग्री और रोजगार का ‘असंतुलन’ दूर किया सकेगा। नहीं तो आने वाले समय में स्थिति और बदतर होने के साथ-साथ नियंत्रण से बाहर भी हो चुकी होगी।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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