अपनी यादों में खोई अग्रसेन की बावली

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Agrasen ki Baoli
Agrasen ki Baoli

दिल्ली के बाराखंबा मेट्रो स्टेशन से जैसे ही मैं बाहर निकली, चिलचिलाती धूप ने स्वागत किया। लेकिन ऐतिहासिक चीजों को देखने की मेरी ललक के सामने ये धूप बहुत कम तेज थी। पूछते-पूछते जैसे-जैसे मैं हेली रोड स्थित अग्रसेन की बावली के नजदीक जा रही थी, वैसे-वैसे मेरे दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं। तरह-तरह के सवाल जेहन में कौंध रहे थे और कदम बावली की ओर बढ़े जा रहे थे। जैसे ही मैं बावली के पास पहुंची, लगा इतिहास उठकर सामने खड़ा हो गया।

स्थानीय लोगों का मानना है कि 60 मीटर लंबी और 15 मीटर ऊंची इस बावली को महाभारत काल में महाराजा अग्रसेन ने बनवाया था। पर इस बावली की वास्तु संबंधी विशेषतायें तुगलक और लोदी काल (13वीं से 16वीं शताब्दी) की ओर इशारा करती हैं। कुछ इतिहासकार इसका निर्माण काल 14वीं शताब्दी मानते हैं। 14वीं शताब्दी के समर्थन में एक मान्यता ये भी है कि मूल रूप में महाराजा अग्रसेन द्वारा बनवाई गई इस बावली को उन्हें मानने वाले अग्रवाल समाज ने 14वीं शताब्दी में दुबारा बनवाया था। बहरहाल, इस बावली में 105 सीढियां हैं और सीढ़ियों के दोनों ओर मजबूत चौड़ी दीवारें हैं जिनमें कई गुप्त दरवाजे, मोखले और कमरे बने हुए हैं। बावली का निर्माण लाल बलुए के पत्थरों से किया गया है।

बावली के प्रवेश द्वार पर एक लोहे का गेट लगा है। सीढ़ियों से इस गेट को पार करने के बाद बावली परिसर में दाईं ओर एक कमरा है जिसके दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। जबकि बाईं ओर एक छोटा मैदान है। यहां एक विशाल पेड़ भी है। मैदान में मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने कुछ और सीढ़ियों से चढकर एक चबूतरा आता है जहां बाईं ओर बावली तक जाने की सीढ़ियां हैं जबकि दांईं ओर एक अस्थायी कक्ष बनाया गया है। इसके सामने एक क्षतिग्रस्त मस्जिद भी है जिसकी छत का एक हिस्सा गिर चुका है। व्हेल मछली की पीठ के समान छत, चैत्य आकृति की नक्काशी युक्त चार खंभों का संयुक्त स्तंभ और चाप स्कंध में प्रयुक्त पदक अलंकरण इसके स्थापत्य को विशिष्टता प्रदान करते हैं।

पुराने जमाने में बावलियों का निर्माण जल के संरक्षण के लिए किया जाता था। लोग जल की महत्ता समझते थे और उसे आदर भी देते थे। ये बावली दिल्ली की उन चंद बावलियों में से एक है जो अभी भी सुरक्षित है। पर यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या काफी कम है। बहुत ही कम लोगों को इसके बारे में पता है। आश्चर्य कि बात तो ये है कि कई स्थानीय लोगों को भी इस बावली की जानकारी नहीं है। यहां घुमक्कड़ स्वभाव के व्यक्ति, फोटोग्राफी के शौकीन लोग और प्रेमी युगल ही नजर आते हैं।

‘बोल बिहार’ के लिए प्रीति सिंह

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