बढ़ते बिहार की बीमार राजधानी

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Growing Bihar Sick Capital
Growing Bihar Sick Capital

कहने को बिहार की राजधानी पटना बड़ी तेजी से मेट्रोपॉलिटन शहर बनने की ओर अग्रसर है पर जब बात स्वास्थ्य सुविधाओं की आती है तो हम इसे सामान्य मानकों पर भी बुरी तरह पिछड़ा पाते हैं। सच यह है कि यहाँ बड़ी संख्या में लोग स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रहे। जनसंख्या के अनुपात में पीएचसी, एपीएचसी, दवाओं की उपलब्धता आदि चिन्ता की हद तक अपर्याप्त हैं। यहाँ तक कि पीएमसीएच और एनएमसीएच जैसे बड़े हॉस्पिटल भी जनसंख्या का दबाव झेलने और स्तरीय सुविधा देने में असमर्थ हैं। हाँ, निजी हॉस्पिटल और नर्सिंग होम इधर बड़ी संख्या में खुले हैं और उनमें से कुछ अच्छा काम भी कर रहे हैं लेकिन वहाँ का खर्च उठाने में कितने लोग सक्षम हैं, ये छिपी हुई बात नहीं।

आपकी राजधानी का स्वास्थ्य कैसा है इसका अंदाजा आपको स्वयं स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों से हो जाएगा। इन आँकड़ों के अनुसार पटना में छह माह से पाँच वर्ष तक के 48 प्रतिशत बच्चे (शहरी इलाकों के) कुपोषण के शिकार हैं, 27 प्रतिशत लोग आज भी इलाज कराने 10 किलोमीटर दूर जाते हैं और 9 प्रतिशत पुरुष और 4 प्रतिशत महिलाएं हाईपरटेंशन से ग्रसित हैं। गर्भवती महिलाओं की बात करें तो पटना जिले के ग्रामीण इलाके की 58 प्रतिशत और शहरी इलाके की 37 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं पहले तीन महीने इलाज कराने नहीं जा पातीं। शहरी इलाकों की 42 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं सो अलग।

पटना के स्वास्थ्य को लेकर एक और महत्वपूर्ण आँकड़ा डायबिटिज का है। संयोग से विश्व स्वास्थ्य संगठन इस साल डायबिटिज की थीम पर ही काम कर रहा है। आपको ये जान कर हैरत होगी कि पटना की 19 प्रतिशत शहरी आबादी डायबिटिज से पीड़ित है। इसका खुलासा स्वास्थ्य विभाग द्वारा 2014-15 में सामाजिक संगठन नोवा नाडिक्स एजुकेशन से तैयार कराई गई एक स्क्रीनिंग रिपोर्ट से हुआ है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों के अनुसार प्रति एक लाख की आबादी पर एक पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र) होना चाहिए जबकि पटना की 58 लाख की आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार) के लिए मात्र 23 पीएचसी हैं और इनमें से 17 में ही रात में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। एपीएचसी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। पटना जिले में 96 एपीएचसी स्वीकृत हैं पर कार्यरत केवल 60 हैं और इनमें से 24 के पास अपना भवन नहीं है।

आज हम और हमारी सरकार ‘बढ़ते बिहार’ की बात करते हैं। बिजली और सड़क जैसे कई क्षेत्रों में बिहार बढ़ा भी है। पर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में हमारा बुनियादी ढाँचा दशकों पीछे हैं। अगर अभी भी हम नहीं चेते तो दशकों को सदियों में तब्दील होते देर नहीं लगेगी।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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