भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथ और प्रोफेसर बलराज मधोक

0
329
Balraj Madhok
Balraj Madhok

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के राजनीति में सक्रिय होने से पहले दक्षिणपंथ के सबसे बड़े नेता रहे प्रोफेसर बलराज मधोक नहीं रहे। कुछ समय से बीमार चल रहे प्रोफेसर मधोक पिछले एक महीने से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे जहाँ कल सुबह नौ बजे उनका निधन हो गया। प्रोफेसर मधोक ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ जनसंघ की नींव रखी थी और अखिल भारतीय छात्र संघ (एबीवीपी) के वो संस्थापक थे। वक्त की विडंबना देखिए कि किसी दौर में भारतीय राजनीति के अत्यन्त महत्वपूर्ण लोगों में शुमार इस शख्स की मृत्यु की जानकारी मीडिया को केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के ट्वीट से मिली..! आज की पीढ़ी अगर उनके कद का अंदाजा लगाना चाहे तो इतना बताना काफी होगा कि उनके जनसंघ के अध्यक्ष रहते हुए ही पं. दीनदयाल उपाध्याय पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रहे थे और 1967 में उनके निवर्तमान होने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे।

25 फरवरी 1920 को जम्मू-कश्मीर के स्कार्दू इलाके में जन्मे प्रोफेसर बलराज मधोक अपने समय के बड़े शिक्षाविद, विचारक, इतिहासवेत्ता, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक थे। नई दिल्ली के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास विभाग के प्राध्यापक रहे प्रोफेसर मधोक ने 1961 और 1967 में क्रमश: नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली का लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया था। आरएसएस के प्रचारक के तौर पर अपनी खास पहचान रखने वाले प्रोफेसर मधोक एबीवीपी के संस्थापक सचिव थे। 1951 में वो भारतीय जनसंघ के प्रथम समन्वयक बने और उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। 1966 में वो भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उन्होंने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी थीं और 1947-48 में ‘ऑर्गेनाइजर’ तथा 1948 में ‘वीर अर्जुन’ का सम्पादन भी किया था।

प्रोफेसर मधोक के जनसंघ के अध्यक्ष रहते पार्टी अपनी कामयाबी के शीर्ष पर थी। उस समय लोकसभा में जनसंघ गठबंधन के पास 50 से ज्यादा सीटें थीं। यही नहीं पंजाब में जनसंघ की संयुक्त सरकार बनी थी और उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित देश के आठ प्रमुख राज्यों में जनसंघ मुख्य विपक्षी दल बनने में कामयाब हुआ था। उस दौर की राजनीति में प्रो. मधोक सम्भवत: एकमात्र ऐसी शख्सियत थे जो पं. जवाहरलाल नेहरू को राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व जैसे विषय पर अपनी बात सुनने को बाध्य कर देते थे। उन्होंने सदन में पं. नेहरू के सामने बिना किसी लाग-लपेट के पुर्तगालियों से गोवा को आजाद कराने और श्रीराम जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और मथुरा के श्रीकृष्ण मन्दिर को हिन्दुओं को सौंपने जैसे मुद्दों को उठाया था। प्रतिबद्ध सोच और राजनीति की मिसाल थे प्रोफेसर मधोक।

इतना सब कुछ होने और 96 वर्ष की दीर्घायु पाने के बावजूद प्रोफेसर मधोक ने अपने जीवन के अंतिम चार दशक राजनीतिक वनवास में बिताए। भारतीय जनसंघ का पहला घोषणापत्र लिखने वाला यह शख्स 50 की उम्र पार करते-करते अपनी ही पार्टी में अप्रासंगिक होने लगा और 1973 में लालकृष्ण आडवाणी के अध्यक्ष रहते पार्टी से निष्कासित तक कर दिया गया। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का युग शुरू हुआ और प्रोफेसर मधोक ‘असमय’ इतिहास के पन्नों में समा गए। ऐसा क्यों हुआ..?

प्रोफेसर बलराज मधोक की कहानी वास्तव में हिन्दुत्ववादी ताकतों के वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष की कहानी है। भारतीय जनसंघ की स्थापना हिन्दू महासभा से निकले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसलिए की थी क्योंकि उन्हें लग रहा था कि हिन्दू महासभा का हिन्दुत्ववादी एजेंडा बहुत संकीर्ण है और वह सफल नहीं हो सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो उस समय महात्मा गांधी की हत्या के बाद की कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था, को इस नए संगठन से राजनीतिक सहारा मिला। भारतीय जनसंघ की पहली कतार के अन्य नेताओं दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, केवल रतन मलकानी और नानाजी देशमुख का भी यही मानना था कि पार्टी की हिन्दुत्ववादी विचारधारा को थोड़ा और लचीला बनाकर ही पार्टी को व्यापक और सुदृढ़ बनाया जा सकता है। साठ के दशक में कांग्रेसविरोधी पार्टियों के एक साथ आने और कई राज्यों में मिली-जुली सरकार बनाने के प्रयोगों ने इस लचीलेपन को और बढ़ाया। यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस राजनीतिक विचार के समर्थन में था। पर प्रोफेसर मधोक की सोच इन सबसे अलग थी।

थोड़ा गहरे उतर कर देखें तो हम पाएंगे कि प्रोफेसर मधोक अन्य पार्टियों के साथ सहयोग के समर्थक तो थे लेकिन उनकी विचारधारा आजादी से पहले की हिन्दू महासभा की तरह के कट्टर हिन्दुत्व के आसपास थी। उन्होंने भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के कथित ‘भारतीयकरण’ का प्रस्ताव रखा था जिसे पार्टी में समर्थन नहीं मिला। इसके बाद प्रोफेसर मधोक और अन्य नेताओं के बीच विरोध तीव्र से तीव्रतर होता गया और अंतत: इस विरोध की परिणति उनके निष्कासन के रूप में सामने आई।

किसी विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध होना गलत नहीं। लेकिन प्रतिबद्धता जब कट्टरता का रूप ले लेती है तो जाने-अनजाने हम वो सारी खिड़कियां बन्द कर लेते हैं जहाँ से ताजी हवा की गुंजाइश रहती है। प्रोफेसर मधोक के साथ बिल्कुल यही हुआ। वो सब दिन मानते रहे कि कट्टर हिन्दुत्व ही सच्ची विचारधारा है। उनके समर्थकों की तादाद लगातार कम होती गई लेकिन वो यह मानने को तैयार नहीं थे कि भारत में लोकतंत्र के विकास के साथ उनकी विचारधारा अप्रासंगिक होती जा रही है।

बहरहाल, प्रोफेसर मधोक को आज दो कारणों से याद करना जरूरी है। पहला कि भाजपा आज जिस प्रशस्त राजपथ पर खड़ी है वो भारतीय जनसंघ की पगडंडियों से गुजरे बिना सम्भव ना थी और इसके लिए वो प्रोफेसर मधोक की ऋणी है और रहेगी। दूसरा कि उन्हें और उनके दौर को याद रखकर ही देश की वर्तमान राजनीति, खास तौर पर दक्षिणपंथ, को पूरी तरह जाना और समझा जा सकता है। आखिर वर्तमान और भविष्य के बीच ‘पाथेय’ तो अतीत का ही होता है।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

Comments

comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here