हिन्दी सिनेमा की गंगा-जमुनी तहजीब और निदा फ़ाज़ली

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Nida Fazli
Nida Fazli

आप किसी की दो पंक्तियां सुनें और आपके मुँह से बस निकल पड़े कि ये फलां की ही हो सकती हैं ऐसा बहुत कम होता है। शब्दों पर अपनी छाप लगा देना सबके बस की बात नहीं। पर निदा फ़ाज़ली उन चंद शायरों में थे जिनके शब्दों में ना केवल उनकी छाप लगा होती थी बल्कि वो छाप आपके भीतर तक उतर जाती थी। “कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं जमीं तो कहीं आस्मां नहीं मिलता” या “दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है/ मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है” या “तू इस तरह मेरी ज़िन्दगी में शामिल है” या फिर “होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है” जैसी पंक्तियां आप सुनते हैं तो दिल और दिमाग पर बस एक अक्श उभरता है और वो निदा फ़ाज़ली का होता है।

‘निदा’ अर्थात स्वर’ और उसके साथ ‘फ़ाज़ली’ की मौजूदगी दूर रहकर भी कश्मीर से हमेशा जुड़े रहने के लिए। निदा फ़ाज़ली का जन्म 1938 में दिल्ली में रहने वाले एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। मुर्तुजा हसन और जमील फातिमा के पुत्र निदा का असली नाम मुक्तदा हसन था। पर शायर के तौर पर उन्होंने खुद को निदा फ़ाज़ली कहलाना पसंद किया। अकारण नहीं था कि उनका ‘स्वर’ जब भी सुर बनकर गूंजा हर बार कश्मीर की वादियां-सी बिछ गईं।

हिन्दी सिनेमा में साहित्य को और साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब को जिन्दा रखने वालों में निदा बहुत खास जगह रखते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि वो जितने उर्दू के थे उतने ही हिन्दी के। सुनकर शायद आश्चर्य हो पर उन्हें शायरी की प्रेरणा सूरदास और कबीर से मिली थी। तभी तो उन्हें जितना उनकी ग़जलों के लिए याद किया जाता है उतना ही बेहद आसान भाषा में लिखे दोहों के लिए। 1990 के दशक में जगजीत सिंह की आवाज़ से सजा और खासा लोकप्रिय रहा उनके दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ भारत की मिली-जुली संस्कृति, सादगी और इंसानियत का आईना ही तो था।

ये निदा फ़ाज़ली की भाषाई तहजीब ही थी जिसने उन्हें आम जनता का शायर बनाया। उनका यही ‘आम’ होना उन्हें और भी ‘खास’ बना देता है। उनके पूरे सफर पर निगाह डालें तो आप पाएंगे कि निदा फ़ाज़ली नाम का ये शख्स हर बार उसी बिन्दु पर खड़ा है जहाँ से ‘आम’ के ‘खास’ बनने की शुरुआत होती है। एक ओर ‘सफर में धूप तो होगी’, ‘खोया हुआ सा कुछ’, ‘आँखों भर आकाश’, ‘मौसम आते-जाते हैं’, ‘लफ्जों के फूल’, ‘मोर नाच’, ‘आँख और ख़्वाब के दर्मियां’ और ‘शहर में गांव’ जैसी यादगार कृतियां तो दूसरी ओर ‘आहिस्ता-आहिस्ता’, ‘आप तो ऐसे न थे’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘सरफरोश’ और ‘सुर’ जैसी फिल्मों के अमर गीत इसी बात की तस्दीक हैं।

निदा फ़ाज़ली ने हिन्दी सिनेमा के लिए उतना नहीं लिखा जितना गंगा-जुमनी तहजीब के बाकी शायरों – मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, गुलजार, जावेद अख्तर – ने लिखा। फिर भी उन्होंने जो और जितना लिख दिया वो इस बात के लिए काफी है कि इन शायरों की सूची उनके बिना पूरी ना हो।

“घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें/ किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए” लिखने वाले निदा फ़ाज़ली जानते थे कि जहाँ मंदिर-मस्जिद के नाम पर आज भी दंगे होते हों वहाँ भाषाई तहजीब के होने और ना होने से क्या और कितना फर्क पड़ सकता है। इस तहजीब को उन्होंने ‘गंगा-जमुना’ की बराबर-बराबर स्याही डालकर बड़ी शिद्दत से निभाया, साहित्य और सिनेमा दोनों जगह।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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