दिलीप कुमार और ‘भारतरत्न’ का पैमाना

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Dilip Kumar with wife Saira Banu in Lilavati Hospital, Mumbai
Dilip Kumar with wife Saira Banu in Lilavati Hospital, Mumbai

‘ट्रैजेडी किंग’ दिलीप कुमार को पिछले साल देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया। उन्हें ये पुरस्कार मिला ये नि:संदेह प्रसन्नता की बात है लेकिन उनके करोड़ों चाहने वाले उनके नाम के आगे ‘भारतरत्न’ लगा देखना चाहते थे। ऐसा चाहना बेवजह भी नहीं था क्योंकि एक तो इस अभिनेता का कद उस सम्मान के लायक था और दूसरा ये कि कुछ समय पहले इस बात की जबरदस्त चर्चा थी कि केन्द्र सरकार दिलीप साहब को ‘भारतरत्न’ देने की तैयारी में है। पर ना जाने ऐसा क्यों नहीं हो पाया..? काश ऐसा हुआ होता..!

‘पद्म विभूषण’ कोई छोटा सम्मान नहीं। पर दिलीप साहब के बहाने क्यों ना ये खंगाला जाए कि आखिर ‘भारतरत्न’ का पैमाना क्या है..? ‘भारतरत्न’ पुरस्कार की शुरुआत 1954 में हुई थी और अब तक कुल 45 लोगों को इससे नवाजा जा चुका है। कहने की जरूरत नहीं कि अपने-अपने क्षेत्र में ये सभी सचमुच के ‘रत्न’ थे। कला के क्षेत्र की बात करें तो अब तक कुल छह लोगों को ये सम्मान मिला है। वे हैं सत्यजीत रे, फिल्म निर्माता-निर्देशक (1992), एम.एस. सुब्बालक्ष्मी, शास्त्रीय गायिका (1998), पं. रविशंकर, सितारवादक (1999), लता मंगेशकर, पार्श्वगायिका (2001), उस्ताद बिस्मिल्ला खां, शहनाईवादक (2001) और पं. भीमसेन जोशी, शास्त्रीय गायक (2008)। वैसे 1988 में दक्षिण के बड़े अभिनेता एम. जी. रामचंद्रन को भी भारतरत्न (मरणोपरांत) दिया गया था लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि उन्हें केवल उनके अभिनय के लिए यह सम्मान मिला था क्योंकि उनका उत्तरार्द्ध राजनीतिज्ञ का था और वे तमिलनाडु के अत्यंत लोकप्रिय मुख्यमंत्री भी रह चुके थे।

कला के क्षेत्र में जिन लोगों को ये सम्मान मिला वे सभी नि:संदेह इसके योग्य थे। किसी दो राय का यहाँ कोई प्रश्न ही नहीं। लेकिन ये प्रश्न तो होना ही चाहिए कि पार्श्वगायन में जो स्थान लता मंगेशकर का है, क्या अभिनय में वही मुकाम दिलीप कुमार का नहीं..?  पं. रविशंकर अगर सितारवादन के, उस्ताद बिस्मिल्ला खां शहनाईवादन के और एम. एस. सुब्बालक्ष्मी या पं. भीमसेन जोशी शास्त्रीय गायन के पर्याय हैं तो क्या दिलीप कुमार अभिनय के पर्याय कहलाने योग्य नहीं.. ? दिलीप कुमार इनमें से किसी से भी कमतर नहीं। तो फिर उन्हें इस सम्मान से क्यों वंचित किया गया.. ?

भारतीय सिनेमा के प्रति मोहम्मद युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के योगदान को रेखांकित करते हुए अमिताभ बच्चन, जिन्हें दिलीप साहब के साथ ही पिछले साल ‘पद्म विभूषण’ मिला, ने बिल्कुल सही कहा है कि “जब भारतीय सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा तो वह दिलीप साहब से पहले और दिलीप साहब के बाद के काल में बंटेगा”। ये एक महानायक के दूसरे महानायक की महज प्रशंसा में कहे हुए शब्द नहीं हैं। ये सच है, सोलह आने सच। अपने अभिनय की गंगा बहाकर भारतीय सिनेमा के पर्दे को रंगमंच से अलग अस्तित्व दिलाया है ‘भगीरथ’ दिलीप कुमार ने।

1944 में आई उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के समय मौजूद रही पीढ़ियों से लेकर अब तक की पीढियों को जोड़ें तो उन्हें अभिनय का ‘स्कूल’ मानने वाली पीढ़ियों की गिनती आधा दर्जन से अधिक ठहरेगी। दाग (1952), देवदास (1955), नया दौर (1957), मधुमती (1958), मुगले आज़म (1960), गंगा जमुना (1961), लीडर (1964), राम और श्याम (1967), शक्ति (1982), मशाल (1984) और कर्मा (1986) जैसी फिल्में उन्हें जीवित किंवदंती बनाती हैं। अभिनय के द्वारा की गई देश की अविस्मरणीय सेवा को देखते हुए उन्हें 1991 में ही ‘पद्मभूषण’  मिल चुका था। ‘पद्म विभूषण’ देने में 24 साल का वक्त लगना समझ के परे है। और अगर वक्त लगा ही तो उसकी भरपाई ‘भारतरत्न’ देकर की जा सकती थी।

ये भी बता दें कि 24 साल के इस अन्तराल में दिलीप साहब को दो और बड़े पुरस्कार मिले। 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘दादा साहब फालके अवार्ड’ और 1997 में पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’। यानि हर तरह से अब बारी ‘भारतरत्न’ की थी। उन्हें ‘भारतरत्न’ मिलने पर केवल एक बेमिसाल कलाकार का ही नहीं बल्कि समूची अभिनय कला का सम्मान होता।

पुनश्च:

93 वर्षीय दिलीप कुमार पिछले दिनों मुंबई के लीलावती अस्पताल में थे। देश भर की सांसें अटकी थीं उनके लिए। शुक्र है कि वो स्वस्थ होकर घर लौटे। पर जितने दिन वो अस्पताल में रहे ये बात मुझे बार-बार कचोटती रही कि क्या भारतीय सिनेमा का यह ‘रत्न’ ‘भारतरत्न’ पाए बिना ही हमारे बीच से ‘कूच’ कर जाएगा..? हम और हमारी सरकार ऐसा होने दे देंगे..?

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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