नीतीश का नया अवतार और संघमुक्त भारत का निहितार्थ

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23 अप्रैल को पटना में सम्पन्न हुई जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय राजनीति का शंखनाद कर दिया। लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं लेकिन जेडीयू ने नरेन्द्र मोदी के विकल्प के तौर पर नीतीश कुमार को अभी से मैदान में उतार दिया है। राष्ट्रीय परिषद की बैठक में एक ओर अध्यक्ष के रूप में नीतीश की ताजपोशी की गई तो दूसरी ओर गैरभाजपा दलों का एका करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया गया। संदेश स्पष्ट है कि नीतीश अब औपचारिक रूप से राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नेताओं के क्लब में शामिल हो गए हैं।

जेडीयू की ये ‘मह्त्वाकांक्षी’ बैठक थी। इसमें बातें तो कई हुईं लेकिन नीतीश के नए अवतार में पार्टी की आगे की रणनीति तीन मुद्दों पर केन्द्रित होगी, वे मुद्दे हैं – बिहार में सफल शराबबंदी को अन्य राज्यों तक पहुँचाना, नीतीश के संघमुक्त भारत बनाने के आह्वान को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना और समान विचारधारा वाले ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों से गठबंधन कर जेडीयू को बड़े फलक पर लाना। इन तीनों मुद्दों को आप एक साथ जोड़ दें तो साफ-साफ दिखेगा कि नीतीश 2019 की तैयारी में कितनी शिद्दत से जुटे हैं।

ये स्पष्ट है कि बिहार की महागठबंधन सरकार में शामिल कांग्रेस गैरभाजपा विकल्प के तौर पर कभी नीतीश के नाम पर सहमत नहीं हो सकती और ना ही राजद समेत अन्य दलों ने अभी इस संबंध में अपनी राय खुलकर जाहिर की है। (हाँ, नीतीश को ‘पीएम मैटेरियल’ बताना अलग बात है।) लेकिन नीतीश और उनकी टीम जल्दी में दिख रही है। इस जल्दबाजी के दो स्पष्ट कारण हैं। पहला यह कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी जैसा ‘मोदीमय’ माहौल है उसमें उनके विकल्प के तौर पर आक्रामक होकर आने का साहस और तैयारी किसी के पास नहीं दिख रही और इसका फायदा नीतीश और उनकी टीम उठाना चाहती है। दूसरा ये कि बिहार चुनाव के परिणाम के बाद नीतीश की जैसी करिश्माई छवि बनी है उस पर वक्त की धूल-मिट्टी पड़ने से पहले ही उसे भुना लेने की कोशिश की जा रही है।

बहरहाल, नीतीश कुमार मंझे हुए नेता हैं और राजनीति की बिसात पर गोटियां बिठाना उन्हें खूब आता है। उन्हें पता है कि बड़े लक्ष्य के लिए केवल नारेबाजी से काम नहीं चलता, धरातल पर भी बहुत कुछ कर के दिखाना होता है। यही कारण है कि एक ओर वो संघमुक्त भारत का नारा दे रहे होते हैं तो दूसरी ओर शराबबंदी को राष्ट्रीय अभियान बनाने की बात करते हैं। यही नहीं, महिला आरक्षण और स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसे फैसलों को भी राष्ट्रीय फलक पर विकास के नीतीश मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है और इसके मूल में भी वजह वही है।

लब्बोलुआब ये कि नीतीश का संघमुक्त भारत वास्तव में मिशन 2019 का ‘राजनीतिक नामकरण’ है। यूपी चुनाव से पहले अजित सिंह के रालोद और बाबूलाल मरांडी के जेवीएम को मिलाकर अपना ‘कैनवास’ बड़ा करने की कोशिश भी उसी मिशन का हिस्सा है। यूपी में नीतीश की सफलता या असफलता से 2019 की तस्वीर भी बहुत हद तक साफ हो जाएगी। तब भारत ‘संघ’ से मुक्त हो या नहीं लेकिन नीतीश फिलहाल मोदी के संभावित विकल्पों में आगे जरूर दिख रहे हैं।

 ‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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