आँखवालों की ‘रंगभूमि’ में प्रेमचंद का ‘सूरदास’

0
4283

सेवासदन (1918), वरदान (1921) और प्रेमाश्रम (1922) के बाद प्रेमचंद ‘रंगभूमि’ लेकर आए। 1922 के अक्टूबर से अप्रैल 1924 तक लिखा गया यह उपन्यास 1925 के आरंभ तक छप चुका था। भारत के इतिहास में यह वह समय था, जब गांधीजी के प्रभाव में प्रेमचंद ने अपनी बरसों की पक्की सरकारी नौकरी छोड़ दी थी, असहयोग आन्दोलन की जोरदार संघर्ष-लहर आकर ठंडी हो चुकी थी, देश में निराशा छा गई थी, साम्प्रदायिक दंगे हुए थे और आपसी फूट के बीजों के विषैले फल सामने आ रहे थे। आर्थिक क्षेत्र में पूंजीवाद और विशेषत: विदेशी पूंजी की घुसपैठ बढ़ती जा रही थी, देशी और विदेशी पूंजी अपना प्रभाव-क्षेत्र विस्तृत कर रही थी। यद्यपि प्रेमचंद ने ‘प्रेमाश्रम’ में पूंजीवाद के कुछ लक्षण ज्ञानशंकर के व्यक्तित्व के साथ जोड़ दिए थे, फिर भी वह मुख्यत: पूंजीपति वर्ग का नहीं, सामंत वर्ग का ही प्रतिनिधि रहता है। पूंजीपति वर्ग व्यवहार में कैसा होता है, कैसे वास्तविक रूप में हमारे सामने आता है, कैसी चालों और हथकंडों से काम लेता है, कैसे एक ओर सामंतों-राजाओं और दूसरी ओर साम्राज्यवाद के प्रतिनिधियों से सांठ-गांठ करता है, यह सब हमें उद्योगपति जॉन सेवक के व्यक्तित्व में देखने को मिलता है। उसके मुकाबले में प्रेमचंद ने सूरदास को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। गांधीजी जो राजनीति के क्षेत्र में कर रहे थे उसे प्रेमचंद साहित्य में रच रहे थे – पूरी शिद्दत के साथ। कहना गलत न होगा कि सूरदास को सिरजना वक्त की मांग थी। अपने देश और काल के प्रति सजग रचनाकार, और अगर वो प्रेमचंद हों तो कहना ही क्या, की रचनात्मक जरूरत था सूरदास।

सूरदास ‘रंगभूमि’ का नायक है। कहते हैं प्रेमचंद को इसके सृजन की प्रेरणा गांव के अंधे भिखारी से मिली थी। हिन्दी उपन्यास-साहित्य में सहसा हाथों में लकड़ी थामे हुए एक अंधे भिखारी का नायक के रूप में यह अप्रत्याशित प्रवेश अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है। साहित्य की सम्पूर्ण परम्परा में ‘नायक’ का कोई सांचा ऐसा नहीं जिसमें ‘सूरदास’ खड़ा हो सके। ऐसी कोई परिभाषा नहीं जो उसके अगल-बगल से भी गुजरती हो। उसका बाह्य व्यक्तित्व शास्त्रों में वर्णित नायक के तमाम लक्षणों को मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है। नायक के अब तक के सारे प्रतिमान उस तक आते-आते कंगाल हो जाते हैं। फिर भी वह नायक है। वह न केवल ‘रंगभूमि’ के केन्द्र में है बल्कि प्रेमचंद के सिरजे किसी भी पुरुष पात्र से अधिक जीवंत है। एक अंधा भिखारी अकेला पूरी व्यवस्था से लड़ने का साहस रखता है, भटके हुओं को राह दिखाता है, धुर विरोधियों को भी अपना कायल बना लेता है और जीवन के अन्तिम क्षण तक अपने आदर्शों से बिना रत्ती भर डिगे हजारों लोगों का नेतृत्व करता है। नायक भला और क्या करता है ? सूरदास ना केवल नायक है बल्कि प्रेमचंद की तमाम रचनाओं में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि भी है।

सूरदास और जॉन सेवक का संघर्ष ‘रंगभूमि’ के कथानक का केन्द्र-बिन्दु है। ज्यों-ज्यों यह संघर्ष गहराता जाता है त्यों-त्यों प्रेमचंद का आशावाद, उनका जीवन-दर्शन और गांधी के आदर्शों में उनकी आस्था के तमाम अर्थ-संदर्भ खुलते चले जाते हैं और हम पाते हैं कि ‘गोदान’ अगर प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति है तो ‘रंगभूमि’ उनके विचारों की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति। होरी को उन्होंने अपनी संवेदना से सिरजा है तो सूरदास सिर से पैर तक संघर्ष में ढाला गया है। होरी और सूरदास दोनों आजीवन संघर्ष करते हैं लेकिन जहां होरी अपनी तमाम ‘उद्दातता’ के बावजूद हमारी ‘दया’ का पात्र बना रहता है वहीं सूरदास अपनी तमाम ‘असमर्थता’ के बावजूद हमसे ‘दया’ जैसी कोई चीज नहीं मांगता बल्कि हमेशा योद्धा की तरह हमारे सामने आता है बतलाता है कि हारकर भी कैसे सीना ताने रहा जा सकता है।

असहयोग आन्दोलन के असफल होने पर भी प्रेमचंद निराश नहीं हुए थे और उन्हें विश्वास था कि फिर से संघर्ष होगा, फिर से हार या जीत होगी और हमें तब तक खिलाड़ी की तरह मैदान में डटे रहना होगा, अपनी कुशलता और दक्षता को बढ़ाते जाना होगा, जब तक कि हमारी जीत नहीं होती – हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोए तो नहीं, धांधली तो नहीं की। फिर खेलेंगे। जरा दम ले लेने दो। हार हार कर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक न एक दिन हमारी जीत होगी, जरूर होगी। – सूरदास के मुंह से ये प्रेमचंद बोल रहे हैं। प्रेमचंद सूरदास के साथ जितना सहज और एकात्म दिखते हैं उतना अपने किसी और पात्र के साथ नहीं। यही कारण है कि सूरदास आदर्श होने पर भी मानवीय लगता है। स्वयं प्रेमचंद के अनुसार – वह साधु न था, महात्मा न था, देवता न था, फरिश्ता न था, एक क्षुद्र शक्तिहीन प्राणी था, चिन्ताओं और बाधाओं से घिरा था जिसमें गुण भी थे और अवगुण भी। लेकिन परिस्थितियों के विरोधाभास से लड़-लड़कर सूरदास मानवता के जिस स्तर को छू पाया है वहां तक पहुंच पाना प्रेमचंद से ही संभव था। इधर असहयोग आन्दोलन असफल होता है उधर जॉन सेवक के आगे सूरदास की हार होती है… वह शहीद होता है लेकिन एक अपंग, अंधे, दीन भिखारी की शहादत इतनी भव्य हो सकती है कि मन-प्राण अलौकिक अनुभूति से भर जाय – ये केवल प्रेमचंद ही कर सकते थे।

प्रेमचंद अपनी रचनाओं में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की बात करते हैं। इस आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की पूर्ण उपलब्धि अगर कहीं होती है तो ‘रंगभूमि’ में। रंगभूमि से पूर्व सेवासदन, वरदान और प्रेमाश्रम में आदर्श का पक्ष प्रबल है तो उसके बाद कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि और गोदान में क्रमश: यथार्थ हावी होता चला जाता है। अपने उपन्यास ‘गोदान’ या कहानी ‘कफन’ और ‘पूस की रात’ में प्रेमचंद जिस ‘चरम’ को पाते हैं उसकी उपलब्धि ‘रंगभूमि’ से गुजरे बिना सम्भव न थी। इस तरह हम कह सकते हैं कि ‘गोदान’ प्रेमचंद की सर्वाधिक परिपक्व कृति है लेकिन उनकी रचना-यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव ‘रंगभूमि’ है। प्रेमचंद को होरी की राह अंधे सूरदास ने दिखाई थी इसमें कोई संदेह नहीं।

अब जरा आज के कैनवास पर ‘रंगभूमि’ और ‘सूरदास’ को देखें। डॉ. रामविलास शर्मा ने ‘रंगभूमि’ को सन् ‘20 और ‘30 के आन्दोलनों के बीच हिन्द प्रदेश की रंगभूमि कहा था। सच कहा था उन्होंने लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि आज यह ‘रंगभूमि’ पूरे भारत में फैल चुकी है। सिर्फ भारत ही क्यों दुनिया के ज्यादातर मुल्क, खासकर तीसरी दुनिया के कहे जाने वाले मुल्क, ‘रंगभूमि’ की चपेट में हैं। जॉन सेवक के आज असंख्य चेहरे हैं और अनगिनत नाम। वह पहले से अधिक शक्तिशाली, विवेकशून्य और निर्मम है। उसकी ताकत और पहुंच में बेतहाशा वृद्धि हुई है और होती जा रही है। अपनी रचना के अट्ठासी साल बाद ‘रंगभूमि’ कहीं ज्यादा प्रासंगिक है।

गांधीजी ने ‘रंगभूमि’ से भी पंद्रह वर्ष पहले 1909 में ‘हिन्द स्वराज’ लिखकर औद्योगीकरण और पूंजीवाद की जिन आसुरी ताकतों और उनके दुष्परिणामों की बात की थी उसे प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ में सूरदास और जॉन सेवक के संघर्ष के ताने-बाने में जीवंत रूप दिया। ‘हिन्द स्वराज’ की कुछ बातें आज के संदर्भ में अव्यावहारिक हो सकती हैं लेकिन इससे उसके निहितार्थ का महत्व जरा भी कम नहीं होता। मुक्त अर्थव्यवस्था के शोर-शराबे और ब्रांडों की मारामारी में ‘सूरदास’ की सुध भला कौन ले ? अचरज तो ये है कि सैकड़ों साल की गुलामी के बाद भी हम नहीं चेते। हमारा इतिहास गवाह है कि विदेशी ताकतों ने हमें तोड़कर हम पर जितना शासन नहीं किया उससे अधिक हमने स्वयं टूटकर उन्हें शासन करने दिया। टूटने और टूटकर बिखर जाने की नीयति हम स्वयं चुनते आए हैं और आज भी ठीक वही कर रहे हैं। सत्ता के क्षणिक सुख की हवस में हम ‘शाश्वत’ को भूल रहे हैं। हम सिर से पैर तक कर्ज में डूबे हैं औप ‘एफडीआई’ के लिए गरदन झुकाए खड़े हैं। आज ‘पूंजी’ हमारे पास हमारे बिछाए रेड कारपेट पर चलकर आ तो जाएगी लेकिन हम अपनी आनेवाली पीढ़ियों के रास्ते में विषैले कांटे बोने का जो कुकर्म कर रहे हैं उसकी ओर उंगली कौन दिखाएगा ? जाहिर है, आँखवालों की ‘रंगभूमि’ में हमें जरूरत ‘सूरदास’ की ही होगी।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

        

 

 

 

Comments

comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here