बूंद-बूंद को तरसे देश

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देश की राजधानी दिल्ली में हूँ और पानी की भारी किल्लत से जूझ रही हूँ। अब पता चल रहा है कि पटना में दोनों हाथों से पानी उबेछने का क्या परिणाम दिल्ली और देश के अन्य भागों के लोगों को भुगतना पड़ता है। कहते हैं ना ‘’जब खुद के पैर में बिवाई होती है तब दूसरे के फटे पैरों का दर्द पता चलता है।”

बहरहाल, दिल्ली ही नहीं देश के कई भागों में पानी एक बड़ी समस्या बन गई है। महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना समेत दस अन्य राज्य सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। खराब मानसून, पानी की बर्बादी, उसे संरक्षित न करने की हमारी आदत और नदियों की उपेक्षा ने देश को एक ऐसी समस्या की ओर धकेल दिया है जो आने वाले वक्त में और भी भयावह रूप धारण करने वाला है। पानी की किल्लत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अकेले मुंबई में 2 करोड़ लोगों को पानी की आपूर्ति में 30 प्रतिशत की कटौती की गई है। तो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सबसे बड़ा ताल सूख चुका है। महानगरों की ये समस्या अब गांवों की ओर भी रुख कर रही है और इसका सबसे बड़ा कारण हम खुद हैं।

विशेषज्ञों की बार-बार की चेतावनी के बाद भी ना तो सरकार ने और ना ही आम लोगों ने पानी को लेकर कोई नीति बनाई। शहरों में तो फ्लश और शावर कल्चर ने सबसे ज्यादा पानी बर्बाद किया है। अंग्रेजी कल्चर के बाथरूम को स्टेटस सिंबल समझने वाले लोगों ने हिंदुस्तानी संस्कृति की उपेक्षा का परिणाम अब भुगतना बस शुरू ही किया है।

देश में मोटर के द्वारा जमीन के अंदर मौजूद पानी को मनमाने ढ़ंग से निकालने की वजह से भी पानी का जमकर दोहन हुआ। फिलहाल देश में प्रति व्यक्ति 1000 घनमीटर पानी उपलब्ध है जो साल 1951 में 3-4 हजार घनमीटर था। आज जो पानी उपलब्ध है वो बेहद खराब क्वालिटी का है।

महानगरों में वितरण नेटवर्क में गड़बड़ी के कारण रोजाना लाखों गैलन पानी बेकार हो जाता है। जल संरक्षण की नीति नहीं होने की वजह से बारिश का 65 फीसदी पानी बहकर समुद्र में चला जाता है।

जिस देश में नदियों को जीवन का स्त्रोत माना जाता था, जहाँ नदियां माँ के नाम से पुकारी जाती थीं, वहाँ आज नदियों का जो हश्र है वो किसी से छिपा नहीं है। गंगा ‘मैली’ होती जा रही है और यमुना अब ‘काली’ हो गई है। जब उपेक्षा का स्तर इस कदर बढ़ता जायेगा तो स्वत: उसके परिणाम भी भुगतने होंगे। ‘नदियों का देश’ होने के बावजूद हमारी ज्यादातर नदियों का पानी पीने लायक और कई जगह नहाने लायक तक नहीं है।

बहुत पहले शेखर कपूर ने ‘पानी’ नाम से एक फिल्म बनाने की घोषणा की थी। शेखर कपूर ग्लैमर वर्ल्ड के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आने वाले कल की आहट को महसूस कर लिया था। हालांकि कुछ कारणों से आज तक शेखर कपूर की ये महात्वाकांक्षी फिल्म नहीं बन पाई। लेकिन उनकी दूरदर्शिता ने वक्त की पदचाप को पहचान कर हम सभी को आगाह करने का काम जरूर किया। पर हम भारतीय हैं। इतनी आसानी से हम ना तो किसी की बात सुनते हैं और ना समझते हैं। तो परिणाम सामने है।

उधर संवेदनहीनता की हद दिखाते हुए पानी की बूंद-बूंद को बिलख रहे महाराष्ट्र में सरकार ने ना सिर्फ आईपीएल को मंजूरी दे दी बल्कि इस खेल के लिए पिचों के रखरखाव पर लगभग 60 लाख लीटर पानी बर्बाद करने की योजना बना दी। इससे नाराज मुंबई हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने अपनी योजना में बदलाव किया।

सच तो ये है कि पानी के संरक्षण को लेकर ना तो सरकार गंभीर है और ना ही आम आदमी। जीवन की आपाधापी में लोग अंधों की तरह बस भागे जा रहे हैं और प्रकृति के साथ जम कर खिलवाड़ कर रहे हैं। अगर हालात यही रहे तो आने वाला कल इससे भी भयावह होगा और संभवत: तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।

‘बोल बिहार’ के लिए प्रीति सिंह

 

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