शशि और रेखा : इन दो कूलों के बीच कहीं है अज्ञेय का शेखर ‘द्वीप’

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आधुनिक हिन्दी साहित्य में, चाहे वो कविता हो, उपन्यास हो या और कोई विधा, अज्ञेय के कद, उनके योगदान या उनके प्रभाव को मापना संभव नहीं। आप जितनी बार अज्ञेय को देखेंगे उतनी बार वो एकदम नए होकर आपके सामने आएंगे और आपके लिए ये तय करना मुश्किल होगा कि कौन-से अज्ञेय बेहतर हैं। बहरहाल, अज्ञेय को थोड़ा भी जानने वाले जानते हैं कि ‘शेखर’ कितना और कैसे अभिन्न है उनसे। ये ‘शेखर’ केवल उपन्यासविशेष में नहीं बल्कि आद्योपांत है अज्ञेय के यहाँ। इस ‘शेखर’ को आधार ‘शेखर : एक जीवनी’ की शशि ने दिया और विस्तार उसे ‘नदी के द्वीप’ में रेखा से मिला। अगर अज्ञेय की कल्पना ‘शेखर’ के बिना नहीं की जा सकती तो ‘शेखर’ का अस्तित्व इन दो नारी पात्रों के बगैर मुमकिन नहीं। सच तो यह है कि शशि और रेखा नाम के इन दो कूलों के बीच ही कहीं अज्ञेय का शेखर ‘द्वीप’ है, जिसकी तलाश उन्हें हमेशा, हर जगह रही।

पहले बात शशि की। ‘शेखर’ यदि जीवनी बन पाया है तो शशि के कारण। ‘शेखर’ के पूर्वार्द्ध (पहले भाग) में शशि केवल एक बार आती है, शेखर के बचपन की एक स्मृति, एक अनुभूति, एक छोटी-सी घटना के रूप में, पर ‘शेखर’ के उत्तरार्द्ध (दूसरे भाग) का केन्द्र ही शशि है। और यदि अज्ञेय ‘शेखर’ का प्रस्तावित तीसरा भाग लिखते तो नि:संदेह वह शशि की भित्ति पर ही खड़ा होता और इस पर शेखर के किसी अध्येता को संदेह नहीं हो सकता।

शेखर के जीवन में शशि के ‘सम्पूर्ण’ आगमन के पूर्व ‘शेखर : एक जीवनी’ एक घोर जिज्ञासु और आपादमस्तक विद्रोही शेखर, पहले बालक, फिर किशोर और फिर युवा शेखर की अनुभूतियों, बेचैनियों और उसके मन-प्राण को मथने वाले असंख्य प्रश्नों का क्रमबद्ध अंकन, घोर ईमानदार और तटस्थ अंकन है। इस अंकन को हम शेखर के चेतन-अवचेतन में बैठे कुछ स्पष्ट, कुछ धुँधले पर सप्राण चित्रों का ‘एलबम’ कह सकते हैं। इन चित्रों को रंग मिलता है शशि से। शशि के आते ही शेखर के जीवन में घटी अब तक की सम्पूर्ण घटनाओं को, उसकी जिज्ञासाओं, उसके प्रश्नों को एक सूत्र, एक आधार, एक निमित्त मिल जाता है और हम देखते हैं कि ‘शेखर’ का सम्पूर्ण पूर्वार्द्ध शशि तक पहुँचने की तैयारी है। देखा जाय तो ‘शशि’ शशि से पूर्व भी शेखर के जीवन में आ चुकी है – पहले सरस्वती और फिर शारदा के रूप में। और इस तरह शशि ‘शेखर’ के शुरू से अन्त तक फैल जाती है। प्रारम्भ के चित्र अब ‘एलबम’ से निकलकर चलने-फिरने और हँसने-बोलने लगते हैं, उनमें एक नई अर्थ-दीप्ति आ जाती है। वे अब यह कह सकने की स्थिति में आ जाते हैं कि वे क्यों शेखर के उस ‘एलबम’ में हैं, उनकी क्या सार्थकता है। और इस तरह ‘शेखर’ कुछ चित्रों, कुछ घटनाओं, कुछ अनुभूतियों, कुछ जिज्ञासाओं और असंख्य प्रश्नों का पुंजमात्र ना होकर एक सुव्यवस्थित ‘जीवनी’, एक सम्पूर्ण ‘उपन्यास’ बन जाता है।

वो शशि ही है जो बिखरे हुए शेखर को समेटती है। उसकी संवेदना, उसके संघर्ष, उसकी संभावनाओं को उपन्यस्त करती है। इसे शेखर की नियति कह लें, प्रकृति मान लें या परिस्थिति का नाम दे दें – शशि उसकी अनिवार्य परिणति है। वह परिणति इसलिए है कि शेखर का बेचैन व्यक्तित्व कहीं सुकून पाता है तो इसी सप्तपर्णी की छाँह में और अनिवार्य इसलिए कि उसके बिना ‘शेखर’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ दोनों अर्थवान भले ही होते, सार्थक कभी ना होते। अर्थवान होने और सार्थक होने में एक बारीक अन्तर है जिसे समझे बिना ‘शेखर’ को समझना असम्भव है।

अज्ञेय के अधिकांश को समझने के लिए उनका एक सूत्र ही काफी है और वो है  – “दु:ख सबको माँजता है और चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह ना जाने, किन्तु जिनको माँजता है उन्हें वह सीख देता है कि सबको मुक्त रखे।” इसी सूत्र की व्याख्या के लिए उन्होंने ‘शेखर’ को गढ़ा पर जैसे अभी भी उनका मन नहीं माना और उन्होंने रेखा (‘नदी के द्वीप’) की रचना की। रेखा के व्यक्तित्व की आधारशिला इसी सूत्र पर रखी गई है और इस स्तर पर हम देखें तो पाएंगे कि शेखर का वास्तविक विस्तार रेखा है, ना कि भुवन। शेखर के विद्रोह का स्वाभाविक ‘गंतव्य’ है रेखा। व्यक्ति का आभिजात्य क्या है, उसकी सर्वोपरि सत्ता, उसका अखंड चक्रवर्तित्व – यह रेखा के व्यक्तित्व से बखूबी जाना और समझा जा सकता है। शेखर और भुवन – दोनों से आगे, दोनों से अधिक।

रेखा हिन्दी उपन्यास की पहली प्रौढ़ नायिका है – बौद्धिक और संवेदनात्मक दोनों स्तरों पर – जिसे अपनी पूर्णता के लिए नायक की ओर देखना नहीं पड़ता, जो अपने हर निर्णय सौ फीसदी स्वयं लेती है, जो कहीं भी जड़ समाज के आगे घुटने नहीं टेकती, जो केवल अपने अनुभवों से सीखती है, जिसके लिए उसकी अनुभूतियां अन्तिम सत्य हैं, जिसके आँचल पसारने में भी गौरव है और समेट लेने में भी। वह एक ओर एक-एक क्षण के प्रति समर्पित है तो दूसरी ओर जीवन की चरम एक्सटेसी (ecstasy) भी किसी (गौरा) को दोनों हाथों से सौंप दे सकती है। वह जीवन की नदी में उसके प्रवाह, उसकी गति, उसके उफान को सहते हुए किसी द्वीप की तरह शान्त, एकाग्र और अडिग है… जीवन से अलग है पर उसी में लय है… उसको एक नया आयाम, नया अर्थ, नई दिशा देता हुआ… सर्जना के एक-एक क्षण को घोर ईमानदारी से जीता हुआ… एकदम तटस्थ द्वीप, जो स्वयं में सम्पूर्ण है, जिसे किसी सहारे की जरूरत नहीं, बिल्कुल नहीं। यह सही है कि रेखा भुवन से मिलकर ही ‘फुलफिल्ड’ होती है पर उसकी ‘पूर्णता’ इस ‘फुलफिलमेन्ट’ में भी कुछ जोड़ देती है। ठीक वैसे ही जैसे अज्ञेय अपने ‘शेखर’ संग शशि और रेखा के जिन दो कूलों के बीच अस्तित्व पाते हैं, उन्हें थामे भी स्वयं रहते हैं, वो भी हजार-हजार हाथों से।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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