स्त्री : कोरा ‘विमर्श’ या सार्थक परिणति भी..?

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रचलित एक लोकगीत में एक सखी ने दूसरी सखी से पूछा कि तुम्हारा पति तुम्हें कितना प्यार करता है? दूसरी सखी ने जवाब में बताया कि मेरा पति मुझे इतना मान देता है, इतना ज्यादा, इतना ज्यादा कि “मारि मारि मुंगरी से देहिया देला थूर हो / जहिया मारैला त मछली खियावैला जरूर”। यह मात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्त्री का सच नहीं बल्कि कमोबेश विश्व के भीतर संगठित सभी समाजों के भीतर जी रही स्त्री का अन्तर्सत्य है।

सभी संगठित समाजों में विवाह संस्था का निर्णायक तत्व व्यक्तिगत सम्पत्ति है, इसलिए स्त्री का वजूद व्यक्तिगत सम्पत्ति का मालिकाना अधिकार रखने वाले व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिकुड़ा-सिमटा रहने के लिए अभिशप्त है। चूंकि स्त्री सम्पत्ति का मालिकाना हक नहीं रखती, इसलिए उसे किसी भी किस्म के निर्णय की स्वतंत्रता नहीं है। उसका सबसे बड़ा सुख उसकी जीवन-स्थितियों की सीमा में मिलने वाली ऐसी वस्तु में निहित है जिसकी प्रबल इच्छा होने के बावजूद वह स्वयं नहीं खरीद सकती। गंवई समाज में मछली बहुत दुर्लभ खाद्य नहीं है लेकिन उसे खरीदने के लिए वह स्वतंत्र नहीं है। मछली उसे दो कारणों से मिल पाती है – या तो उसके उत्पीड़न से उसे विस्मृत कराना हो या पुरुष उसे अपने प्रति ‘लॉयल’ बनाना चाहे। (आर्थिक रूप से उन्नत घरों की स्त्रियों के लिए मछली की जगह कोई और चीज हो सकती है।) दोनों ही स्थितियों में मौलिक रूप से स्त्री की इच्छा का कोई महत्व नहीं है, इसलिए निशदिन के इन कलापों को स्वाभाविकत: एक सामाजिक नियति मान लिया गया है। अब इसके बाद भी स्त्री की अन्दरूनी हालत की भयावहता का वर्णन मात्र शाब्दिक होगा।

अब एक निगाह उन हालात पर भी डाली जाय जहाँ मालिकाना हक स्त्री के पास है। बड़े एवं संयुक्त परिवारों में पिता या पति (अमूमन) की वसीयत के अनुसार चाबियों का गुच्छा लटकाए दीदी या दादी क्या अपनी मौलिक इच्छा की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र हैं? बहुत गौर से देखिए, वे मात्र न्यासी हैं और परिवार के भले के लिए ही कोई निर्णय लेती है। उनका व्यक्तित्व परिवार के व्यकितत्व से एकाकार हो चुका है। महाभारत में सत्यवती व्यक्तिगत सम्पत्ति की मालिक है। उसका शासन निष्कंटक है लेकिन वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा को लेकर कतई स्वतंत्र नहीं है। उम्र में भीष्म से छोटी होने के बावजूद शान्तनु की मृत्यु के बाद उसे बाकी जीवन विधवा के रूप में ही गुजारना पड़ा। दरअसल जिस ‘अनुबंध’ के तहत सत्यवती हस्तिनापुर आई उसके मूल में स्त्री (सत्यवती) की बेहतरी की भावना नहीं थी, बल्कि अनुलोमज संतान के राज्याधीश होने का विचार था। इसलिए सत्यवती के निर्णय राज-व्यवस्था को ध्यान में रखकर होते थे। भारत की समाजिक संरचना और उसमें स्त्री की भूमिका को प्रतिबिम्बित करने में यह उदाहरण बहुत हद तक सहयोग करता है।

अब आज का परिदृश्य देखें। आज गुणात्मक रूप से स्त्रियों की बड़ी संख्या घर से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने में लगी हैं। अपनी इच्छा-आकांक्षा को लेकर ज्यादा चैतन्य और चौकस हुई हैं। घर से बाहर आकर खुली हवा में सांस लेना सीख गईं हैं वे, लेकिन फिर भी श्रमजीवी ही हैं। हाँ, पारम्परिक रूप से श्रमजीवी होने के बावजूद बाहर किए जाने वाले श्रम के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक ने उनके वजूद में गम्भीरता पैदा कर दिया है। ये एक बड़ा परिवर्तन है पर उससे भी बड़ा सच ये है कि मूल रूप से वे उसी पुराने समाज में रह रही हैं। इसीलिए सदियों की बनी धारणाएं, जो कि सारत: सड़ी-गली हैं, उन्हें समझने में अक्षम हैं। इन्हीं वजहों से स्त्रियां भाषिक हिंसा का शिकार हो रही हैं।

वास्तविकता ये है कि शासन-व्यवस्था में सम्मिलित सम्पत्तिधारियों के हितों के अनुरूप ही स्त्री का बहिर्गमन सम्भव था या है। स्त्री को ध्यान में रखकर किसी संस्थान की स्थापना नहीं की गई। यह और बात है कि बाहर निकलकर स्त्री स्वकेन्द्रित भी हुई है और उसने भरसक अपनी भूमिका को प्रभावी बनाया है। लेकिन मौलिक रूप से उसकी इच्छा या आकांक्षा का उसी सीमा तक प्रस्फुटन हो सकता है जहाँ तक सम्पत्तिशाली तबके के लिए वह घातक ना बने। भला यह कैसे हो सकता है कि सम्पत्ति के जिस अधिकरण में स्त्री स्वयं एक ‘कमोडिटी’ है उसके कायम रहते हुए ही वह स्वतंत्र हो जाय? इस संदर्भ में मृदुला गर्ग का बहुचर्चित उपन्यास ‘कठगुलाब’ बड़ी महत्वपूर्ण कृति है। यदि उपन्यास की कथावस्तु पर ना भी जाया जाय तो यह तथ्य साफ तौर पर सामने आया है कि नारीवाद के पर्दे में भी पुरुष उन्हीं लिप्साओं और जुगुप्साओं में बुरी तरह लिप्त है जिनका विरोध करते हुए वह नारीवादी आन्दोलन का हिमायती माना गया।

हम चाहे जितने लेख लिख दें, नारे लगा लें, जितनी भी लड़ाई लड़ लें, पुराने और सड़े हुए ढांचे में निर्णय ढाक के तीन पात ही होना है। चाहे दहेज में हीरो होन्डा ना ला सकने वाली प्रताड़ित और आग के हवाले कर दी जाने वाली बहू हो या सवर्णों द्वारा नंगी घुमाई जाने वाली फूलन देवी या दिल्ली की चलती बस में गैंगरेप कर सड़क के किनारे मरने के लिए फेंक दी गई ‘निर्भया’, चाहे रोटी-प्याज मांगने वाली बूढ़ी को डायन कह ढेले मार-मारकर समाप्त कर देने वाले ग्रामीणों का लोमहर्षक कृत्य। स्थान और कालभेद के बावजूद सभी की नियति एक जैसी है। बहुओं को जलाने वाली सासों को दंड देने का कानूनी प्रावधान तो है लेकिन जरूरत इन सासों के भीतर अस्तित्वमान ‘पुरुष’ को पहचानने की है।

सिमॉन द बोउवा ने अपनी किताब ‘द नेचर ऑफ सेकंड सेक्स’ में स्त्री की जैविक संरचना को लेकर उसकी सामाजिक स्थिति का बेबाक विश्लेषण करते हुए इस बात पर विशेष जोर दिया कि मूल सामाजिक ढांचे में स्त्री की भूमिका पुरुष से अधिक प्रभावी होने के कारण ही पुरुष के अधीन है। स्त्री ने अपनी ऊर्जा सर्जनात्मक क्षेत्रों में ज्यादा खपा दी और उसमें अधिकार के प्रति आवश्यक उत्साह ना रहा।

लैंगिक आधार पर दोयम दर्जे के व्यवहार का प्रथमदृष्टया विरोध होना चाहिए। इस विरोध की सार्थक परिणति भी हो, इसके लिए लगातार उसे हालात की कसौटी पर कसना भी जरूरी है। स्त्री-विमर्श को लेकर जो उथल-पुथल दशकों से मची हुई है उसका मूल्यांकन इन्हीं वजहों से समीचीन है।

‘बोल बिहार’ के लिए डॉ. ए. दीप

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